हिंदी दिवस (14 सितंबर)/शिवकुमार विवेक

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ब हिंदी कौन सिखाए। हमारा सुबह का शिक्षक तो भाषा-भ्रष्ट हो गया। सुबह-सुबह दरवाज़े पर आ जाता था। लगभग एक घंटे साथ रहकर कुछ शब्द सुधार जाता था तो कुछ नए दे जाता था। हमने कई शब्द तो उसी से सुने-सीखे थे। वह शब्दों को लेकर कभी-कभी लंबी-लंबी बहसें भी किया करता था। 

यह हिंदी शिक्षक हमारा अखबार था। ज़माना ज्यादा दूर नहीं, कोई बीस-पचीस साल पीछे का था। लोग अपने बच्चों को कहते थे कि हिंदी सीखनी है तो अखबार पढ़ो। अब उल्टा हो गया।अखबार पढ़ोगे तो भाषा खराब हो जाएगी।

अखबार ऐसा कैसे हो गया। वह तो समाज को बौद्धिक नेतृत्व देने वाला माना जाता था। जैसे वह स्पष्ट और सही मत-अभिमत देने की जवाबदारी निभाता है, सूचनाओं की सत्यता और पवित्रता की प्रतिबद्धता रखता है, वैसे ही शुद्ध भाषा का आग्रह रखना चाहिए। इसी जिम्मेदारी, जवाबदारी व आग्रह ने उसे परिवारों का अभिन्न हिस्सा बनाया था। 

वह इस आग्रह से कैसे फिर गया? कुछ लोग तर्क देते हैं कि यह अखबार की ही नहीं, समाज की गिरावट का असर है। अब समाज में भाषा का आग्रह कितना है? पत्रकार भी तो उसी समाज से आते हैं। एक अखबार के संपादक अक्सर कहते थे- अच्छी हिंदी लिखने वालों का अकाल पड़ रहा है। इसलिए अक्सर अखबारों में सपाट और व्याकरण की दृष्टि से दोषपूर्ण भाषा देखने को मिलती है। 

इसमें दोराय नहीं कि अखबार की भाषा बहुत सपाट हो गई। वह वाक्य विन्यास और गठन के लिहाज़ से सही हो सकती है लेकिन वह अब मुहावरों, अलंकारों, शब्दशक्तियों और सामासिक शब्दों के गहनों से सुसज्जित नहीं हैं। इसलिए उससे सूचना तो मिलती है, सूचना की छाप या स्मृति अंकित करने में वह मददगार नहीं होती। अखबार में ललित लेखन अब कम हो रहा है। साहित्य से इतर, आम आदमी को यही ललित लेखन संवेदनशील और जागरूक बनाता है। 

हालाँकि यह तर्क आंशिक सच है कि समाज में ऐसे लोगों की संख्या कम हो गई। सच यह भी है कि आपको ऐसे लोग चाहिए भी नहीं। क्योंकि आपकी प्राथमिकताएं अलग हैं। ऐसे लोग जो अखबार बनाएँगे, वह आपकी जरूरत पूरी नहीं करेगा। ऐसे लोगों के लिए गाँठ भी ढीली करनी पड़ेगी। ऐसे लोग समय भी लेंगे जो आपके पास नहीं है। आप बहुत जल्दी में हैं और अपने पाठक और व्यापक रूप में समाज को समझने या सिर खपाने के लिए तैयार नहीं करना चाहते। आपके पास भाषा की जो ही श्रेष्ठता है, वह इसी तरह के जो चंद लोग आपके पास हैं, उन्हीं की वजह से है। 

पहले अखबार ऐसा करते थे। वे भाषा के जरिये कुछ शब्दों को प्रचलन में लाते थे, कुछ प्रचलित गलत शब्दों को सुधारते थे और कुछ नए शब्द लोगों की ज़ुबान पर लाते थे। ऐसे ही भाषा के संस्कार डाले जाते हैं। आप उम्दा संस्कारित समाज में रहेंगे तो आपको अलग तरह का सुख व आश्वस्ति मिलेगी। 

पिछले दस-बीस साल से मीडिया ‘हिंगलिश’ के मोह में फँस गया है। अंग्रेज़ी मिश्रित हिंदी आम आदमी की ज़ुबान पर आ गई है। हिंदी अखबारों ने या तो सचेतन रूप में इसे अपना लिया या उसमें काम करने वालों के प्रयोग में यह अनायास आ बिराजी। इस चक्कर में वह यह भूलता रहा कि कितने अंगरेजी शब्द वास्तव में आम आदमी की जुबां पर हैं। मसलन, एमडीएम का मतलब मिड डे मील है, यह लोगों को नहीं पता लेकिन अखबारों में छपता है। डेस्क का व्यक्ति यह साहस तक नहीं कर पाता कि मध्यान्ह भोजन लिख दे। भैया, हिंदी के इस बेचारे शब्द को भी तनिक समझ लेते। 

अंगरेजी शब्दों के लोकभाषा में प्रचलित होने का एक पैमाना नहीं है। यह मामला स्थानीय स्तर पर अलग-अलग होता है। एक संपादक ने रिक्शे वाले से कहा कि उन्हें विश्वविद्यालय ले चले तो वह समझा नहीं। उनके यूनिवर्सिटी कहते ही वह बोला-’अच्छा, इनवरसिटी जाने है।’ इसके बाद उन्होंने अखबार में यूनिवर्सिटी लिखना शुरू किया। लेकिन इधर आप सागर चले जाइए तो यूनिवर्सिटी की जगह लोगों को विश्वविद्यालय ही बोलता पाएँगे।

दूसरी बात यह कि लोग भले रोजमर्रा की बातचीत में हिंदी शब्द न बोलते हों, उन्हे जानते जरूर हैं। जब जानते हैं तो आप हिंदी अखबार वाले उसे लिखने में गुरेज़ क्यों करते हैं। जो भाषा आपको रोटी दे रही है, आप उसे प्रचलन से बाहर करने में मददगार क्यों बने हैं। आप अपनी जड़ों में खुद मट्ठा डालकर पेड़ को सुखा रहे हैं। आप हिंदी की सेवा नहीं, उसका नुकसान कर रहे हैं। आपको भले ही सेवा-मेवा शब्दों से परहेज़ हो, लेकिन आप अपने पेशागत कर्तव्य से बेफ़िक्र तो हैं। 

एक अखबार ने चार पन्नों के अपने परिशिष्ट में भरपल्ले अंगरेजी शब्दों का प्रयोग शुरू किया। उनका मानना था कि वे चार पन्ने युवाओं के लिए तैयार किए गए हैं और उनकी यही भाषा है। इसका असर यह हुआ कि पूरे अखबार की भाषा खराब हो गई। पाठकों की तीखी प्रतिक्रिया के बाद कुछ सुधार करना पड़ा। पाठक की प्रतिक्रिया का अर्थ था कि वह ऐसी खिचड़ी नहीं चाहता। दूसरी भाषाओं के कुछ शब्द लेने के प्रति हिंदी सदैव उदार रही है। यही चरित्र दुनिया की हर भाषा का है। सो उतना लो जितना जरूरी और ग्राह्य हो। 

मेरे सामने जब किसी अंगरेजी शब्द पर निर्भर रहने की स्थिति आती है तो मैं सोचता हूं कि मेरी हिंदी क्या इतनी ग़रीब है कि उसमें अभिव्यक्ति के लिए किसी अंगरेजी शब्द का पर्याय या समानार्थी शब्द नहीं है? और मुझे हमेशा कोई सुंदर शब्द मिलता है। हमने पिछले सालों में ऐसे शब्द खोजने और अंगरेजी के किसी आगंतुक शब्द का नया पर्याय गढ़ने की कोशिश ही छोड़ दी है। यह काम अखबार पहले बख़ूबी करते थे। टाइम्स समूह की पत्रिका ‘दिनमान’ ने रिपोर्ताज जैसे कई नए शब्द दिए। आतंकवाद के दौर में जंगजू शब्द अखबारों की ही देन था। हिंदी में कार सेवा पंजाबी से आया। स्वाभाविक नवाचार के प्रति भाषा खुली रही है और उससे उसका सौंदर्य व संप्रेषण क्षमता बढ़ती रही है। पर अतिक्रमण चेहरा बिगाड़ता है। 

एक समय मध्यप्रदेश का ‘नईदुनिया’ अखबार भाषा के मामले में शब्दकोश और पाणिनी के व्याकरण की पाठशाला की तरह था। उसमें एक शब्द भी त्रुटिपूर्ण या अशुद्ध छपने पर पाठक टोकता था और पाठक के ऐसे पत्र प्रकाशित होते थे। जिस अखबार में रोज बीसियों ग़लतियाँ होती हों, वह भला किसी शब्द की गलती बताने की जुर्रत कर सकता है?  नईदुनिया में शब्दों के प्रयोग पर ‘पत्र संपादक के नाम’ स्तंभ में लंबी बहसें चला करती थीं। संपादक को अपनी टिप्पणी के साथ इन पर विराम लगाना पड़ता था। कई शब्द प्रयोगों को तय करने के लिए संपादकीय वरिष्ठों की बैठकें हुआ करती थीं। तब तय होता था कि यूरोप की जगह योरप, जाफना की जफना, ललथनहवला या पेईचिंग लिखना है। अब अखबारों में स्टाइल शीट की वैसी सख़्ती नहीं है।

कुछ अखबारों ने शब्द ही नहीं, कॉपी भी खत्म कर दी है। इस तर्क के साथ कि अब लोगों के पास पढ़ने का समय कम है। लिहाज़ा वे सूचनाओं के पुलिंदे जैसे हो गए हैं। ऐसे अखबारों में भाषा-शैली का मज़ा भी खत्म हो गया। उन्हें अब न्यूनतम भाषा की जरूरत है। इसलिए प्रिय पाठक, कृपया अखबार में भाषा की बात मत करिए। यह हिंदी बाल पोथी नहीं है। 

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