@ राकेश अचल
‘ बकलोल ‘ एक बहुचर्चित मुहावरा है । सियासत में आजकल इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है । प्रत्येक राजनीतिक दल में ‘ बकलोल ‘ विशेषज्ञ होते हैं और वे इतनी बकलोल करते हैं की कभी-कभी सुनकर गुस्सा आता है तो कभी-कभी तरस। यदा-कदा ये बकलोल मनोरंजन के काम भी आती है। मध्यप्रदेश में अब यही बकलोल राजा- महाराजा के बीच शुरू हो गयी है। राजा यानि दिग्विजय सिंह और महाराज यानि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया।
मध्यप्रदेश में राजनीति किसी भी दल की हो उसमें ये राजा-महाराजा आज भी प्रासंगिक है। ये कभी एक ही दल में होते हैं और कभी आमने -सामने। पिछले सात दशक में ये क्रम बदलता रहा है और कोई दो साल पहले इसमें फिर बदलाव आया जब दो दशक तक कांग्रेस में रहने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया अचानक भाजपा की गोदी में जा बैठे। सिंधिया ने हाल ही में राजा दिग्विजय सिंह के गढ़ राघौगढ़ में जाकर कोई एक हजार लोगों को भाजपा में शामिल कराया तो राजा का रक्त उबाल बिंदु पर आ गया । उन्होंने सिंधिया को ‘ गद्दार ‘ कह दिया।
पिछले चार दशकों से भाजपा भी सिंधिया परिवार के पुरुष सदस्यों को अपनी सुविधा के अनुसार ‘ गद्दार ‘ कहती रही है ,लेकिन सिंधिया परिवार की महिला सदस्य भाजपा को कभी ‘ गद्दार ‘ नजर नहीं आयी । भाजपा ने उन्हें सदा सम्मान दिया। कांग्रेस को तो सिंधिया पहली बार गद्दार दिखाई दिए हैं ,अन्यथा कांग्रेस ने भी चार दशक में सिंधिया का चंवर और छत्र पूरी निष्ठा के साथ उठाया है। सिंधिया को ‘ गद्दार ‘ कहने वाले राजा दिग्विजय सिंह को भी लोगों ने सिंधिया के सामने मुजरा करते देखा है। हालांकि राजा ने ये मुजरा केवल माधवराव सिंधिया के निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की रस्म पगड़ी के समय किया था।
आजादी के बाद से ही राजनीति में सिंधिया परिवार राजनीति में सक्रिय है ,लेकिन किसी भी दल ने इस कथित ‘ गद्दार’ परिवार को अस्पृश्य नहीं माना। पहले कांग्रेस ,फिर जनसंघ और आज भाजपा में भी सिंधिया शीर्ष पर हैं। सिंधिया परिवार की कथित गद्दारी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की एक वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई पर लिखी सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता से चर्चित हुई। ये कविता सिर्फ कविता थी लेकिन बाद में इसकी लय और शब्दावली सियासत के इतने काम आयी की बिना किसी गवाह-सबूत के राजनीतिक दल सिंधिया परिवार को गद्दार कहने का पुरुषार्थ दिखाते आ रहे हैं। बहुत कम लोगों को पता होगा कि जिस कांग्रेस कि वरिष्ठ ही नहीं बल्कि शीर्ष नेता राजा दिग्विजय सिंह सिंधिया परिवार को गद्दार कह रहे हैं उसी कांग्रेस की सरकार ने मध्य्प्रदेश में पाठ्यक्रमों में शामिल रानी लक्ष्मी बाई कि अध्याय में से सिंधिया की कथित गद्दारी की पंक्तियाँ विलोपित कराई थी।
बहरहाल बात बकलोल की चल रही थी । ये बकलोल प्रदेश में बदले सियासी परिदृश्य का परिणाम है। प्रदेश में आने वाले महीनों में पंचायत चुनाव होने वाले हैं। दो साल पहले सत्ताच्युत हुई कांग्रेस को इन पंचायत चुनावों में अपना कसबल दिखाना है। जाहिर तौर पर ये चुनाव राजा बनाम महाराज होने वाले हैं। कमलनाथ इस चुनाव में उतने प्रभावी नहीं होंगे जितने कि राजा और महाराज। चुनाव जीतने कि लिए बकलोल करना राजा की मजबूरी है और कांग्रेस कि लिए जरूरी भी। लेकिन सिंधिया कि सामने मुजरा कर चुके राजा उन्हें कैसे गद्दार साबित कर पाएंगे ये देखना रोचक होगा।
आजादी कि पहले के इतिहास के पन्ने पलटकर देखिये तो आपको पता चलेगा की सिंधिया और राघौगढ़ के खींची परिवार के बीच अदावत आज की नहीं बल्कि दो सदी पुरानी है। बात 1816 की है उस समय उस दौरान राघोगढ़ के राजा थे बलवंत सिंह। वे पहले तो वो पेशवा के सामने सिर झुकाते थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया वे अंग्रेजों के साथ हो गए । जब अंग्रेजों और महादजी शिंदे के बीच युद्ध हुआ (पहला मराठा-अंग्रेजी युद्ध), तब बलवंत ने ब्रिटिश का पक्ष लिया। गुस्साए महादजी शिंदे ने 1785 में अम्बाजी इंगले के नेतृत्व में एक भारी सेना राघोगढ़ भेजी और गद्दारी का सबक सिखाया। राजा बलवंत सिंह और उनके बेटे जय सिंह को बंदी बना लिया गया। इसके बाद जयपुर और जोधपुर के राजपुर घराने लगातार महादजी पर दबाव बनाने लगे कि वो राघोगढ़ राजपरिवार को पुनर्स्थापित करें। दोनों राजघराने राघोगढ़ राजपरिवार के रिश्तेदार थे। महादजी ने आखिर में उनकी माँगें मान ली।
राजपथ से लोकपथ पर आ चुके इन दोनों परिवारों की अदावत अब चौथी पीढ़ी में आ चुकी है। ये खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। राघोगढ़ राजपरिवार के वंशज आजादी के बाद भी सिंधिया राजघराने से मिली हार का टीस नहीं भूल पाए। सियासत में राघौगढ़ राज परिवार के मुखिया दिग्विजय सिंह को जब भी मौका मिला उन्होंने सिंधिया को किनारे धकेलने का प्रयास किया। 1993 में माधवराव सिंधिया के प्रत्याशी को पीछे छोड़ दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बनना होबने । 2018 में ज्योतिरादित्य सिंधिया को दरकिनार कर उन्होंने कमलनाथ का समर्थन किया और डेढ़ साल की कांग्रेस सरकार में ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दीं की सिंधिया को कांग्रेस छोड़कर जाना पड़ा ।
बहरहाल राजा-महाराजा एक बार फिर आमने -सामने हैं। देखना होगा की ये संग्राम भविष्य में क्या शक्ल अख्तियार करता है ?आने वाले दिनों में क्या राजा के साथ उनके बेटे विधायक जयवर्धन भी संग्राम में शामिल होते हैं या नहीं। सिंधिया के बेटे को भी इस अदावत को आगे जारी रख पाएंगे या फिर युद्धविराम होगा दोनों पूर्व रियासतों के बीच।

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