चंडीगढ़. इंडिया डेटलाइन

. किसानों के मुद्दे पर पंजाब में अकाली दल की जो फ़ज़ीहत हुई है, तक़रीबन वही हरियाणा में जननायक जनता पार्टी की हो रही है। राज्य की भाजपा सरकार में पार्टी के उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के सामने राजनीतिक संकट घिर रहा है। वे सरकार में रहते हैं तो राज्य के आंदोलनकारी किसानों का समर्थन खो सकते हैं जो ज्यादातर जाट हैं। चौटाला का वोट बैंक में जाट ही रहे हैं। जाटों के दूसरे नेता कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा उन पर अंगुली उठा रहे हैं।

पंजाब में अकाली दल ने भी कृषि व कृषि विपणन से जुड़े तीन विधेयकों पर केन्द्र की एनडीए सरकार का साथ दिया लेकिन राज्य के गाँव-गाँव में किसान आंदोलन गहराते ही इससे पल्ला झाड़ लिया। अभी दुष्यंत चौटाला भी कह रहे हैं कि कांग्रेस किसानों को गुमराह कर रही है। हमारे एनडीए से रिश्ते मजबूत हैं। 

दुष्यंत की पार्टी सुरक्षित खेल रही है। हरियाणा में किसानों पर पिछले दिनों हुए लाठी चार्ज की जाँच की माँग कर रही है तो विधेयकों पर भाजपा का साथ दे रही है। वह किसानों को आश्वस्त कर रही है कि समर्थन मूल्य दिलाने में वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। उसका कहना है कि हुड्डा बिचौलियों के हाथों में खेल रहे हैं जो किसानों को लहरियाणा पंजाब से सटा हुआ प्रदेश है इसलिए वहाँ का किसान आंदोलन से बेअसर नहीं रह सकता। लेकिन यहाँ भाजपा की सरकार है जबकि पंजाब में किसानों को राज्य की कांग्रेस सरकार का समर्थन प्राप्त है क्योंकि नए क़ानून से राज्य की आमदनी का बड़ा ज़रिया खत्म हो जाएगा। किसानों को मंडी में उपज बेचने की बाध्यता खत्म हो जाएगी और वे देश भर में कहीं भी सौदा कर सकेंगे। साथ ही वे कृषि में जरूरी संसाधनों के लिए एग्रीमेंट के जरिये पूँजी के स्रोत को आमंत्रित कर सकेंगे। पंजाब के सुशिक्षित व संपन्न किसान के लिए यह मुफ़ीद सौदा होगा। हरियाणा में चौटाला की पार्टी यही समझाने की कोशिश करेगी। 

लेकिन दिक़्क़त यह है कि दुष्यंत की पार्टी का राज्यव्यापी जनाधार नहीं है। पार्टी के पूर्वज और मूल पार्टी के संस्थापक चौधरी देवीलाल और बाद में उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला जाटों के लगभग एकछत्र नेता रहे लेकिन शिक्षक भर्ती घोटाले में उनके और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी बेटे के जेल जाने के बाद लोकदल कमज़ोर पड़ा और बाद में टूटकर एक धड़ा दुष्यंत के साथ आ गया जिसने जननायक जनता पार्टी बनाई। विधानसभा में वह दस सीटें लेकर तीसरा बड़ा दल बना। मूल लोकदल उनके चाचा अभय चौटाला के साथ रह गया जिसने विधानसभा में सिर्फ एक सीट जीती। 

दुष्यंत ने भाजपा के साथ जाने में फ़ायदा देखा। एक जाट लीडर को साथ रखना भाजपा की भी राजनीतिक मजबूरी है। उनके पिता, दादा व परदादा सभी भाजपा के स्वाभाविक मित्र रहे हैं लेकिन समस्या यह हाल कि यदि उनकी जाटों और किसानों पर पकड़ कमजोर होती है तो इसका फ़ायदा भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ले जाएँगे और राज्य में अगले चुनाव में कांग्रेस की वापसी का रास्ता प्रशस्त हो जाएगा। इसलिए न दुष्यंत को और है न भाजपा को ठौर। साथ रहना ही मुफीद है। आने वाले दिन दुष्यंत चौटाला के लिए अग्नि परीक्षा के होंगे।

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