क्या बॉलीवुड को खत्म करने की कोशिश की जा रही है? क्या सिनेमा उद्योग का नया ठिकाना बनाकर इसे मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री के समांतर खड़ा किया जाएगा? 

हाल की कुछ घटनाओं ने इस तरह की हलचल के संकेत दिए हैं। कंगना रनौत के धर्मयोद्धा की तरह उभार, सुशांत सिंह राजपूत के बहाने फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी क्षेत्रों की प्रतिभाओं से कथित भेदभाव, बॉलीवुड में शोषण, अंडर वर्ल्ड के निवेश, आतंकवादियों व अपराधियों से कथित से रिश्ते जैसे मुद्दों पर अंतहीन बहस और दक्षिणपंथी अथवा राष्ट्रवादी फिल्मकारों की सार्वजनिक मंचों पर सक्रियता से इसकी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। शनिवार को योगी आदित्यनाथ की इस घोषणा ने इसे और बल दिया कि नोएडा में देश की सबसे बड़ी फिल्म सिटी बनाई जाएगी। इसके बाद ‘हिंदी फ़िल्मों का हिंदी क्षेत्र में नया ठिकाना’ बनाने की चर्चा छिड़ गई है। 

बॉलीवुड के कामकाज के तौर-तरीक़ों को लेकर इन दिनों खूब बहस चली है। पहली बार इसकी इतनी परतें उधेड़ी जा रही हैं। यही नहीं, इस बहाने इसके औचित्य पर सवालिया निशान भी लगाए जा रहे हैं। इस बहस को फिल्म इंडस्ट्री के लोग ही उठा रहे हैं। कंगना रनौत, विवेक अग्निहोत्री बगैरह इस मामले में सबसे आगे हैं। कंगना को एक तरह से फिल्म उद्योग की धर्मयोद्धा की तरह पेश किया जा रहा है। उनके भाजपा की तरफ राजनीतिक रुझान को देखते हुए यह अनुमान लगाना ग़ैर वाजिब नहीं कि वे इसे सोचे-समझे एजेंडे के तहत काम कर रही हैं। 

कुछ संयोगवश, अपनी ग़लतियों से या कुछ सुनियोजित तरीके से बॉलीवुड आजकल दो हिस्सों में बँटा है। या तो फिल्म वालों में राष्ट्रवादी बनाम वाम या मध्यवर्ती विचारधारा का संघर्ष उभरता दिख रहा है या भाई-भतीजों बनाम नए और बिना गॉडफ़ादर वाले कलाकारों-फ़िल्मकारों पर चर्चा हो रही है। जया बच्चन के बयान और उस पर हुई प्रतिक्रिया ने बॉलीवुड के चरित्र में शुद्धतावाद पर हो रही बहस में सेलिब्रिटी फिल्मकारों को उलझा दिया। सुशांत सिंह-रिया के मामले के बहाने यह मुद्दा गरमाया। बॉलीवुड पहले ही कई कोनों से सडाँध मार रहा था। शनिवार को पायल घोष का अनुराग कश्यप के खिलाफ यौन शोषण के आरोप लेकर सामने आना इस सड़ाँध का एक और ताजा झोंका है। 

तो क्या यौन कुंठाओं, उत्पीड़न, शोषण, भाई भतीजावाद से भरपूर, मादक पदार्थों के खुले गटर से उफनते, काले धन और अपराधियों व आतंकवादियों के धन से इठलाते, मनोरंजन के नाम पर विकृतियाँ परोसते इस उद्योग का अंत आ गया है? सहारा के पूर्व संपादक निशीथ जोशी का मानना है कि ये समस्याएँ बॉलीवुड को खा रही हैं लेकिन वह सुधारवादी क़दम लेने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए कुछ लोग वैकल्पिक फिल्म इंडस्ट्री खड़ी करने के बारे में सोचने लगे हैं। मुंबई के फिल्म समीक्षक अनुकल्प का कहना है कि कंगना रनौत इस तरह की सोच रखने वालों का एक ‘मोहरा’ हैं। 

बॉलीवुड के विरोध में एक तर्क यह दिया जा रहा है कि यह हिंदी फ़िल्मों का प्रतिनिधि उद्योग नहीं है। हालाँकि यह तथ्य सही नहीं है। दूसरा तर्क है कि हिंदी फ़िल्मों का उद्योग हिंदी भाषी क्षेत्र में ही होना चाहिए। इससे उसे पनपने का ज्यादा मौक़ा मिलेगा। हिंदी क्षेत्र या उत्तर भारत की प्रतिभाओं को न्यायपूर्ण जगह मिल सकेगी। कंगना रनौत ने कहा कि यह सोचना गलत है कि बॉलीवुड सर्वोच्च हिंदी फिल्म उद्योग है। तेलुगु फिल्म उद्योग इससे आगे है और उसने कई हिंदी फ़िल्में भी दीं। बॉलीवुड ही भारतीय फिल्म उद्योग नहीं है। एक भारतीय सिनेमा इंडस्ट्री में कई फिल्म सिटी हो सकती हैं। हमारी कमज़ोरियों से ही हॉलीवुड नंबर है। 

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को एक विशाल फिल्म सिटी नोएडा में बनाने का ऐलान करते हुए कहा कि देश को एक अच्छी फिल्म सिटी की जरूरत है। हम एक उम्दा फिल्म सिटी तैयार करेंगे। यह फ़िल्म सिटी फ़िल्म निर्माताओं को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराएगी। फिल्म संपादक कहते हैं-योगी एक पात्र हैं। भूमिका कहीं और से लिखी जा रही है। नोएडा एक फिल्म सिटी पहले भी बना चुका है जो कामयाब नही हुई। मुंबई में फ़िल्मी पत्रिका ‘स्टार डस्ट’ के संपादक रह चुके संतोष प्यासी का मानना है कि मुंबई का फिल्म उद्योग बेमुकाबला है। यह हिंदी-अहिंदी, उत्तर-दक्षिण का मामला नहीं है। यहाँ देश के हर कोने का आदमी है। यह सब उत्तरप्रदेश  नहीं दे पाएगा। वे कहते हैं-’अभी इंतज़ार करना होगा। यह पूरा मामला राजनीतिक है और फिलहाल सबके एजेंडे में बिहार व महाराष्ट्र के चुनाव हैं।’

बॉलीवुड में आज जितनी भी बुराइयाँ दिखें, इसने दुनिया भर में भारतीय फ़िल्मों का परचम फहराया है। लोग मानते हैं कि इसने कई अहिंसा भाषी क्षेत्रों में हिंदी को भी लोकप्रिय बनाने में मदद की। साथ ही, कुछ अच्छे विषयों पर संवेदनशील और संदेशात्मक फ़िल्में दीं। यहाँ सभी भाषाओं में मिलाकर प्रति वर्ष 2000 तक फिल्में बनती हैं। भारतीय सिनेमा किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक लोगों द्वारा देखी गई सबसे ज्यादा फिल्मों का उत्पादन करता है। वर्ष 2016 में इसकी आय 2.1 बिलियन डॉलर यानी  154,581,315.000 भारतीय रुपया थी जिसमें पिछले चार साल में 11 प्रतिशत मिश्रित वार्षिक वृद्धि दर (सीजीएआर) आँकी गई। अब यह आय 3.7 बिलियन तक होने का अनुमान रखा गया है।

नई फिल्म सिटी बनाने का विचार मूल रूप में अनुचित नहीं कहा जा सकता। नए मंच, अवसर और जगह फ़िल्म निर्माण को बढ़ावा ही देंगी जिससे प्रतिभाओं के लिए अवसर भी बढ़ेंगे। यदि इस विचार के साथ नोएडा में नई फिल्म सिटी बनाई जाती है तो इसे फिल्म उद्योग के विस्तार की दृष्टि से ही देखा ज़नाना चाहिए। इसकी स्थापना का यही घोषित लक्ष्य होना चाहिए। नकारात्मक विचार इसका भला नहीं करेगा। सभी भाषाओं में फ़िल्मों का निर्माण करने से भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ही मजबूत होगी। हिंदी फिल्म किसी भी फिल्म सिटी में बन सकती है, वैसे ही दूसरी भाषाओं की फिल्म। इसलिए हिंदी व अहिंदी के मामले को विभाजनकारी खाँचे में ढालकर नहीं देखा जाना चाहिए। यह ठीक है कि बॉलीवुड ने तमाम बुराइयों में सनकर-लिपटकर अपनी शक्ल बिगाड़ ली जिसकी वजह से वैकल्पिक उद्योग खड़ा करने की बात उठने लगी है। बेहतर होगा कि बॉलीवुड ही अपने कायाकल्प पर विचार करे। उसका समावेशी व वैविध्यपूर्ण स्वरूप बरक़रार रखना ही उसके हित में है। अपने ही अंतर्विरोधों और बुराइयों के कारण इस महान उद्योग का क्षरण देश के लिए शुभ नहीँ। 

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