डॉ. महेश परिमल का छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. अकादमिक कैरियर है। पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 750 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन का लम्बे लेखन का अनुभव है। दैनिक भास्कर न्यूज पेपर व दैनिक भास्कर डॉटकॉम में अपनी सेवाएं देते रहे। उनकी हिंदी पर जबर्दस्त पकड़ है। वे अमेरिकी धरती पर हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में भी भाग ले चुके हैं।

डॉ. महेश परिमल

अब तक जीवन तो नहीं, पर हम तेजी से भाग रहे थे। उसी जीवन को अनदेखा करते हुए, जिसके लिए हम जीना चाहते हैं। कई बार जिंदगी ने हमें रोकने की कोशिश की, ज़रा थम जाओ, इतनी तेजी से कहां भागे जा रहे हो। रूक लो, सांस ले लो, घर-परिवार की ओर भी एक नजर डाल लो। बच्चों से बात कर लो। पत्नी का हाल-चाल पूछ लो। बूढ़े माता-पिता के पास बैठकर अपना बचपन याद कर लो। इन सारी बातों को छोड़कर हम सब भागे जा रहे थे। हम कहां भाग रहे थे, हमें खुद ही इसका पता नहीं था। भागना हमारी नियती थी। क्योंकि सभी भाग रहे थे। जिंदगी को छोड़कर किसी बियाबान की तरफ…।

इस भागती जिंदगी पर अचानक कोरोना ने ब्रेक लगा दिया। लगा, सब कुछ थम गया। अचानक आए इस अवरोध के लिए कोई तैयार ही नहीं था। अब क्या होगा, यह सवाल हर कोई एक-दूसरे से पूछ रहा था। जिसका जवाब किसी के पास नहीं था। जिंदगी थम गई, पर नहीं थमी, तो वह थी जिजीविषा। रोजी-रोटी तो चलानी ही थी। इसलिए घर की सभी का केंद्र बिंदु हो गया। घर में ही रहकर जाना कि क्या होता है घर? अब तक तो यह हमारे लिए किसी धर्मशाला से कम नहीं था। आपाधापी में हम सब कुछ भूल गए थे। इस बीच कई त्योहार आए। पहले आया होली, तब सभी ने महसूस किया अपनों के बीच अपनापा। सारी कटुता रंगों में घुल गई। एक नए जिंदगी हमारा इंतजार करने लगी। घर के सदस्यों के बीच वार्तालाप बढ़ने लगा। सभी एक-दूसरे को समझने लगे। जो दूरियां थीं, वह सिमटने लगी। कभी हंसी-मजाक भी हो जाता। अपनों की हंसी इतनी निश्छल होती है, यह पहली बार जाना। इस हंसी में घुल गई सारी कटुता। हम सब करीब आए। इसी बीच बच्चे को पता चला कि पापा इतना अच्छा गा भी लेते हैं। पापा का यह रूप तो केवल मम्मी की यादों में ही था। भैया तो बांसुरी कितनी अच्छी बजा लेता है, किसी को पता है। दीदी की तो न पूछो, वह तो मन्ना डे के शास्त्रीय गाने कितने अच्छे से गा लेती है, किसी को पता है। मम्मी ने तो कथक में एम.ए. किया है, यह तो किसी को भी नहीं पता। सभी जानते हुए भी एक-दूसरे की प्रतिभाओं से अंजान थे। पोते को भी पहली बार पता चला कि 75 की दादी मां इतने अच्छे से भजन भी गा लेती हैं। उनके पोपले मुंह से भजन सुनना कितना आल्हादकारी था, यह किसी ने नहीं जाना था। अरे! सब छोड़ो, मम्मी कितनी अच्छी-अच्छी मिठाइयां बनाती हैं, यह किसने जाना था। पता चला कि यदि सभी का थोड़ा-थोड़ा सहयोग मिल जाए, तो मम्मी बहुत-कुछ कर सकती है।

सब-कुछ नया-नया-सा लगने लगा। इस कोरोना ने जीवन को पूरी तरह से ऊर्जामय कर दिया। कई प्रतिभाएं सामने आईं। सभी कुछ न कुछ नया करने लगे। बाहर जाने पर बंदिशें थीं, तो घर पर ही अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर मिला। साधन सीमित थे, पर संभावनाएं अपार थीं। पता चला कि जो चींजे अब तक बाजार से ला रहे थे, उससे अच्छा तो हम बना लेते हैं, भले ही वह पिज्जा हो या फिर कुछ और सामान। घर में ही रखे सामान से हमने कुछ ऐसा बना लिया, जो सभी को भला लगा। सृजन के इस आनंद का लाभ सभी ने लिया। अखबार-टीवी से पता चला कि बाकी दुनिया के हाल तो बहुत ही बुरे हैं। विषाद के इन क्षणों में हमारा सृजन संसार काफी विस्तृत हो गया। हम स्वावलम्बी हो गए। आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया गया हमारा यह कदम हमें किन ऊंचाइयों तक ले गया, इसका हमें पता ही नहीं था। जब अपनों की दृष्टि हमारे सृजन की ओर गई, तब पता चला कि हमारे भीतर का अकुलाता कलाकार बाहर आ गया है। रिश्ते मीठे होने लगे हैं।

अब हम सब अपनी जड़ों की ओर लौटने लगे हैं। उन जड़ों को हम छोड़ चुके थे। अतीत का हिस्सा बन गई थीं हमारी जड़ें। आज पता चला कि सचमुच कितनी मजबूत हैं हमारी जड़ें। अब जाना कि कितने त्योहार होते हैं, जो अपनों को अपने से मिलाने का काम करते हैं। संकोच की दीवारें टूटीं, लोग खुलकर बतियाने लगे। जिस पापा के घर आते ही सन्नाटा छा जाता था, उसी पापा को बच्चे घोड़ा बना रहे थे। दादा-दादी या फिर नाना-नानी से जाना कि उनका कितना महत्व है, हमारे जीवन को चलाते रहने में। जीवन की संतुष्टि देने का काम कर रहे हैं सभी। अब तक जो चीजें कबाड़ की शोभा थीं, वही चीजें नए रूप में हमारे सामने आ गईं। सावन सोमवार, रक्षा बंधन, जन्माष्टमी के अलावा जन्म दिन भी इस बार विशेष लगे। ये सब हमसे कब छूटकर अलग हो गए थे, फिर हमसे आ मिले।

अब हमने जाना कि साफ-सफाई का जीवन में कितना महत्व है। घर में जड़ी-बूटियों से बनने वाली जो चीजें हमें नहीं भाती थीं, वही अब जायकेदार लगने लगी हैं। अब जाना कि आखिर दादी और मां रोज पेड़ों की पूजा क्यों करती थीं। अब जाना कि आंगन में तुलसी का पौधा कितना जरूरी है। त्योहार क्यों जरूरी है। उसी से हमने पाई ऊर्जा। हममें मिलनसारिता बढ़ गई है। हम सब काफी करीब आ गए हैं, कभी न दूर जाने के संकल्प के साथ। सोचो, यदि कोरोना का यह कहर न होता, तो क्या हमें इस तरह के जीवन के दर्शन होते? आभार कोरोना, मजबूरी में अवसर तलाश करने की शक्ति देने का….

डॉ. महेश परिमल

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