राजेश बादल

राज्य सभा का मानसून सत्र करीब एक सप्ताह पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया, लेकिन बीते दिनों राज्य सभा में जो भी हुआ, वह बेहद शर्मनाक है। सदन की कार्रवाई के दरम्यान पक्ष, प्रतिपक्ष और संचालन करने वाले डिप्टी चेयरमैन, सभी ने संवैधानिक मर्यादाओं और संसदीय परंपराओं के प्रति गरिमा और आदर नहीं दिखाया तो मीडिया भी पीछे नहीं रहा। उप सभापति का रवैया तो घोर आपत्तिजनक था ही, लेकिन प्रतिपक्ष ने भी कोई जिम्मेदाराना बरताव नहीं किया। संसद संचालन की नियम पुस्तिका फाड़ने और माइक तोड़ने के प्रयास तथा आसंदी पर सवार होने की कोशिश किसी भी सभ्य लोकतंत्र का सुबूत नहीं है।

ताज्जुब की बात है कि डिप्टी चेयरमैन खुद ही ऐसा व्यवहार कर रहे थे, जो किसी संसदीय पीठ पर विराजे विद्वान के लिए शोभा नहीं देता। खास तौर पर उस स्थिति में, जबकि आसंदी पर बैठे सज्जन की ख्याति एक बौद्धिक संपादक और विचारक की रही हो। मत विभाजन के लिए दिया गया उनका मासूम तर्क गले नहीं उतरता। सदन संचालन की जिम्मेदारी हर हाल में आसंदी की होती है। सरकार उनकी ओर से काम नहीं कर सकती। लेकिन इस मामले में तो सरकार ने ही जैसे उप सभापति का दायित्व संभाल लिया था।

डिप्टी चेयरमैन हरिवंश सिंह अच्छे पत्रकार और संसदीय प्रक्रिया के जानकार माने जाते रहे हैं। एक जमाने में देश की प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका रविवार में वे संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह के सहयोगी हुआ करते थे। मैं उन दिनों रविवार के लिए खास रिपोर्टिंग करता था। इस तरह हम लोग एसपी की टीम का हिस्सा थे। तब श्री हरिवंश की छवि चमकीले पत्रकार की थी। उसके बाद वे एक दैनिक से जुड़े और फिर राज्य सभा में प्रतिष्ठित हुए। सदन में रविवार के घटनाक्रम के बाद पत्रकारिता जगत में श्री हरिवंश से जुड़ी अनेक कथाएं भी उजाग़र हो रही हैं। यकीनन इनसे उप सभापति के बारे में कोई उज्जवल छवि नहीं बनती।

लेकिन मेरी चिंता पक्ष, विपक्ष और आसंदी के गैर जिम्मेदार व्यवहार के बारे में नहीं है। गंभीर मसला यह है कि संसद की कार्रवाई का कवरेज भी प्रकाशन और प्रसारण माध्यमों में गरिमापूर्ण नहीं था। लोकतंत्र के इस सर्वोच्च मंदिर के बारे में रिपोर्टिंग के अपने कुछ उसूल हैं, कुछ परंपराएं हैं और नियमावली है। मगर पत्रकारिता ने उस दिन की रिपोर्टिंग में इन उसूलों, परंपराओं और नियमावली को ताक में रख दिया। कुछ माध्यम उप सभापति के पीछे पड़े थे तो कुछ विपक्ष के। अभी तक अदालती मामलों के मीडिया ट्रायल की निंदा होती रही है, लेकिन अब तो पत्रकारों ने संसद-ट्रायल भी शुरू कर दिया है। यह बेहद अफ़सोसनाक है। संसदीय प्रक्रिया की रिपोर्टिंग पक्षपातपूर्ण और राजनीतिक चश्में से कतई नहीं हो सकती।

सोशल मीडिया के तमाम नए-नए अवतार दक्ष पत्रकार और संपादक संचालित नहीं करते। जो पेशेवर पत्रकार इनसे जुड़े हैं, उनकी तादाद अत्यंत कम है। अधिकतर तो आम नागरिकों के हाथ में ही हैं। दुर्भाग्य से उन्हें न तो संसद के नियमों की जानकारी है और न उसकी कार्रवाई के अंशों को अपने प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल करने की बंदिशें पता हैं। वे अपनी अपनी विचारधारा के हिसाब से सदन के भीतर के व्यवहार पर ऊल-जलूल टिप्पणियां करते हैं। अनेक मामलों में यह विशेषाधिकार हनन की श्रेणी में भी आता है। चाहे वह वॉट्सऐप हो, ट्विटर हो, इंस्टाग्राम हो, फ़ेसबुक हो या फिर सामूहिक ईमेल या फोन संदेश हों-उन पर भी दोनों सदनों के अंदर की गतिविधि को तोड़-मरोड़कर या ट्विस्ट करके नहीं भेजा जा सकता। क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है मिस्टर मीडिया?

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