डॉ. महेश परिमल

डॉ. महेश परिमल


यह बात कोरोना काल के पहले की है। क्लास में जब टीचर ने पूछा कि कौन-कौन अपने दादा-दादी या नाना-नानी के साथ रहता है। तो केवल एक स्टूडेंट ने हाथ उठाया। सभी अपने उस साथी को आश्चर्य से देखने लगे। जब उस स्टूडेंट से कहा गया कि दादा-दादी के साथ रहने का अनुभव सुनाए, तो बच्चे ने उनके साथ रहने के कई किस्से सुनाए। सभी खुश हो गए। जब छात्र अपनी सीट पर बैठा, तो उसके बगल में बैठने वाले साथी ने पूछा -दादाजी कैसे होते हैं? तब उसने जवाब दिया- दादाजी बिलकुल पापा की तरह ही होते हैं, पर उससे भी अच्छे होते हैं। मुझे बहुत प्यार करते हैं। हां, तब बुरा लगता है, जब वे पापा को भी कभी-कभी डांट देते हैं। यह सुनकर साथी को बहुत आश्चर्य हुआ। क्या पापा भी गलती करते हैं? उन्हें भी कोई डांट सकता है? सचमुच दादा यानी बहुत बड़ी शख्सियत का नाम होगा।
तो यह किस्सा है हमारी सिमटती हुई जिंदगी का। पहले जिंदगी दोनों हाथों के दायरे से भी बड़ी हुआ करती थी। उसमें विस्तार था। जिसमें पूरा परिवार समा जाता था। एक ही घर में सारे रिश्ते-नाते जुड़े होते थे। धीरे-धीरे जिंदगी सिमटती गई। लोग सिकुड़ते गए। परिवार के सदस्यों की संख्या कम होने लगी। अधिकतम दो संतानों वाले परिवार बढ़ते चले गए। किसी-किसी घर में एक ही संतान होने लगी। इधर लोग कम होने लगे, उधर लोगों की जरूरतें बढ़ने लगीं। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा टूटने लगी। सारे रिश्ते अंकल-आंटी तक सिमट गए। गांव से यदि बाबूजी अपने बेटे के पास कुछ दिनों के लिए आ गए, तो बेटे को बताना पड़ता है कि कजिन आए हुए हैं। पिता को पिता कहने में शर्म जो आती है।
पर जब बच्चों का सामना अपने दादा-दादी से होता है, तो वे उन्हें बहुत अच्छे लगते हैं। उनका दुलारना बच्चों को खूब भाता है। जब अपने पोपले मुंह से बच्चों से प्यार से बातें करते, तो बच्चों को अच्छा लगता है। उनकी बातें भी बहुत प्यारी और भली होती हैं। वात्सल्य उनकी बातों में झलकता था। डांटना तो उनके शब्दकोश में होता ही नहीं था। बड़ी से बड़ी शरारतों के बाद भी उसे अनदेखा करते हुए कुछ ऐसा कहते कि बच्चों को अपनी शरारतों पर शर्म आती, जिसे बाद में वे न दोहराने का संकल्प ले लेते थे। दादा-दादी कुछ दिनों के लिए ही आते, तब बच्चों के दिन बहुत ही अच्छे से गुजरते। उनके जाने के बाद फिर वही उदासी। पापा-मम्मी की नौकरी, दोनों शाम को थके-हारे लौटते, तब उनमें इतनी भी ऊर्जा नहीं होती कि बच्चों के साथ प्यार से बातें करते हुए उनके साथ खेलें। बच्चों का समय भी अपने होमवर्क, ट्यूशन और कोचिंग में कट जाता।
इन हालात में वे बच्चे दूसरे बच्चों के लिए विशेष होते हैं, जो अपने दादा-दादी के साथ रहते हैं। इन बच्चों में एक अनदेखा अनुशासन होता है, जिसे वे अपने बुजुर्गों से अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं। इन बच्चों में जो प्रतिभा निखरकर सामने आती है, वह भी अपने-आप में बेजोड़ होती है। ये बच्चे पूरी क्लास में कुछ अलग ही रुचियों के साथ सामने आते हैं। चूंकि इन बच्चों का काफी वक्त अपने बुजुर्गों के साथ गुजरता है, इसलिए कुछ बेबाक भी होते हैं। उनकी कई फरमाइश जो पिता पूरी नहीं करते, वे दादा-दादी से पूरी हो जाती है। ये बच्चे सभी के साथ रहते हुए कुछ विशेष बातों में अपना अलग ही प्रभाव छोड़ते हैं। इसलिए अपने दादा-दादी से वंचित बच्चे का यह पूछना स्वाभाविक है कि दादाजी कैसे होते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर सहज नहीं है। बच्चे द्वारा पूछा गया इस सवाल का जवाब बहुत ही कठिन है। कठिन इसलिए कि यह सहजता से पूछा गया है। वास्तव में सरल होना ही बहुत कठिन काम है। आज के हालात में घर में दादा-दादी का होना आश्चर्य की बात है। पर यदि वे हैं, तो समझो, घर का हृदय धड़क रहा है। सभी की सांसों का स्पंदन बड़े-बुजुर्गों में समा जाता है। उनका होना ही घर को बहुत बड़ी राहत देता है। बच्चों के जन्म दिन पर बुजुर्ग ही सबसे बड़े सलाहकार होते हैं। घर में दादी होने का मतलब ही है कि रसोई में स्वादिष्ट व्यंजन का बनना। अचार-बड़ी-पापड़ का होना। बच्चों की सेहत को देखते हुए घर में ठंड के लड्‌डुओं का बनना। किस बच्चे को क्या पसंद है, यह बच्चों की मां से ज्यादा दादी को पता होता है। बच्चों की छोटी-छोटी बीमारियों में दादी मां के नुस्खे ही काम आते हैं। इसीलिए बच्चों के लिए पहले तो दादा-दादी होते हैं, मम्मी-पापा बाद में।
कई बच्चों के लिए उनके दादा-दादी या तो गांवों में हैं, या फिर तस्वीरों में, रही-सही कसर वृद्धाश्रमों ने निकाल दी है। पर अब यह सुनकर अच्छा लग रहा है कि दो अनाथ युवक-युवती ने शादी के बाद वृद्धाश्रम जाकर वहां से अपने लिए माता-पिता ले आए। एक अच्छी परंपरा की शुरुआत हुई। इधर दो अनाथ, उधर दो बेसहारा, ये सभी मिलकर बने एक परिवार का हिस्सा। जहां सभी अपने बन जाते हैं, एक-दूसरे का सहारा। इन सभी के अपने छोटे-छोटे दु:ख, जो आगे जाकर सभी की खुशियों में तब्दील हो गए। बेसहारों को मिला सहारा। पराए बन गए अपने। बस गया छोटा-सा आशियाना। जहां खुशियां एक-दूसरे का इंतजार करती रहती हैं।
इस कोरोना काल में हमने जान लिया, क्या होता है घर में बुजुर्गों का होना। घर में बार-बार याद किया जाता रहा दादा-दादी को, नाना-नानी को। कई बार उन सबकी कमी बेहद खली। कभी जन्म दिन पर, तो कभी त्योहार पर। कई संस्कार मम्मी भूल गई और कई पापा को याद नहीं रहे। आखिर कितने साल हो गए, घर और घरवालों से दूर हुए। कहां तक याद रखा जाए। इसलिए बड़े परिवार में सबके साथ रहना आज की पीढ़ी के लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा है। बच्चों को इसीलिए आश्चर्य होता है कि कैसे दिखते होंगे दादाजी या दादीजी। बच्चों के लिए ये पोपले मुंह वाले लोग एक तरह से अनजाने ही हैं। शायद इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए बच्चे ने दोस्त ने पूछ लिया-कैसे होते हैं दादाजी…

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