तनिष्क के एक विज्ञापन पर बवाल , यहां हर पल कोई बहाना चाहिए…

राजीव सक्सेना,जयपुर
फिल्मलेखक,निदेशक,समीक्षक

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कोई पीने का बहाना ढूंढे..

कोई जीने के बहाने खोजे….

ताज़्ज़ुब तब होता है कि हम हर पल…’लड़ने के बहाने’ ढूंढा करते हैं..साथ – साथ कदमताल करते हुए भी…..यूं ही.. बेवजह..

दूरियां.. दुश्मनी…कोई एक विज्ञापन फ़िल्म इस बार… लव जेहाद नामक

मनगढंत… जुमले को हवा देने का बायस साबित हो गई..

एक जाने माने टीवी पत्रकार रोहित सरदाना तो अनूठी  खोज कर लाये कि….बम्बई के  फ़िल्म उद्योग की बुनियाद ही ‘हिन्दू विरोधी’ है… हर फ़िल्म की कहानी.. में हिन्दू किरदार… गलत साबित किया जाता है और मुसलमान पात्र… को इंसानियत का दूत बताकर महिमामंडित किया जाता रहा है…

स्मरण पटल पर, शायद नेटवर्क धुंधला सा है.. ठीक से याद नहीं आ रहा, जबलपुर के विनीत थिएटर में 1979 में देखी थी ‘धूल का फूल ‘…स्व. मनमोहन कृष्ण  साहब एक बच्चे को गोद में उठा कर गाते हैं  .. तू हिंदू बनेगा ना मुस्लमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा .. तब किशोर उम्र थी… उतना समझ में नहीं आया कि गाने के बोल ऐसे क्यों हैं..

होश सम्हालने की 18-20 साल की उम्र में पहली बार सुना कि देश के कुछ हिस्सों में हिंदू – मुस्लमान आपस में लड़ते भी हैं  .. फिर तो फिल्मों में भी जाति भेद साफ समझ आने लगे.. ‘अमर अकबर एंथॉनी ‘ ..कुर्बानी, अल्लाहरक्खा .. जैसी सैकड़ों फिल्मों में दोस्ती की दास्तान देखने को मिली..

बौद्धिक किस्म के लोगों की तरह परिवार में धर्म को लेकर वाहियात बातें करने के बेहूदा रिवाज ना हों तो बच्चों, नौजवानों में शायद ये ज़हर कभी ना घुले…

पर आम तबके को भला कौन सम्हाले..

इधर, पिछले दो तीन दशक में राजनीतिक स्वार्थ ने ज़रूर खासी हवा दी… और, एक नहीं अनेक मौक़े आये, जब हम अपने ही कलीग… खास दोस्त तक.. को एक पल  शक़ की बुनियाद पर तौलने से नहीं चूके..चूंकि रिश्तों की नींव उससे कहीं अधिक पुख़्ता रही तो खास फ़र्क नहीं पड़ा..

जिन घरों में, चाहे आस्था के  चरम  में ही सही, ज़रा सी बीमारी पर बच्चे के गले में तावीज़, काला धागा पहनाकर निश्चिंत हो जाना आम बात थी… ख़ुशी के मौकों पर देवी को चुनरी चढ़ाकर… सीधे दरग़ाह में चादर चढ़ाने के बाद ही ख़ुशी पूरी मानी जाती रही हो, वहां भेद भाव की जगह कतई मुमकिन नहीं रही…

हमारे बौद्धिक समुदाय ने… साहित्य, कला, संस्कृति….से जुड़े लोगों… .और  शिक्षक वर्ग  ने सत्तर से अस्सी के दशक में अंतर्जातीय या अन्तर्समुदाय विवाह की मिसाल पेश कर… बिगड़ते माहौल को संदेश देने की कोशिशें की, जो कमोबेश आज भी जारी हैं…

सिनेमा, संभवतः इस मामले में हर बार आगे रहा है…भारत भूषण साहब की नाज़िमा जी से शादी के बाद.. सुनील दत्त – नर्गिस जी..किशोर कुमार – मधुबाला जी सरीखे अनेक उदाहरण रहे…संगीत की दुनिया से एक बड़ा नाम सरोद वादक उस्ताद अमज़द अली खां साहब का है, उन्होंने असम से अपने ही फील्ड की शुभलक्ष्मी बरुआ जी को जीवन साथी चुना… क्रिकेट से मशहूर पटौदी रियासत के वारिस, भोपाल रियासत से भी जुड़े मंसूर अली खां साहब को बांग्ला सुंदरी शर्मिला टैगोर पसंद आईं… रंगमंच में मशहूर शख्सियत जनाब हबीब तनवीर साहब ने.. कलकर्मी मोनिका मिश्रा को हमसफ़र बनाया तो सफ़दर हाशमी साहब ने रंगकर्मी मलयश्री जी को सहधर्मिणी बनाया ..एक्ट्रेस तबस्सुम जी ने एक्टर अरुण गोविल के बड़े भाई सुबोध गोविल से विवाह रचाया..अभिनेत्री शीबा के पति हैं आकाशदीप जो फिल्मकार हैं…मशहूर राइटर डॉ. राही मासूम रज़ा  साहब की बहू पार्वती खान एक जानी मानी सिंगर हैं ..

 साहित्य जगत में.. शरद जोशी साहब ने, प्रोफ़ेसर नईम साहब की पत्नी की  बहन…यानी साली  इरफाना जी को जीवनसाथी चुना..तो कहानीकार मेहरुन्निसा परवेज़ जी ने आई ए एस भगीरथ प्रसाद जी से विवाह किया..विविध भारती के सुप्रसिद्ध उद्घोषक  कहानीकार ममता सिंह और लेखक यूनुस खान का विवाह भी इस सिलसिले मे उल्लेखनीय है..

ये तमाम बुद्धिजीवी व्यक्तित्व… यकीनन नई पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा साबित हुए..

फ़िल्म लेखक सलीम खान और जावेद अख्तर साहब के परिवार भी इस मामले में आगे ही मानें जायेंगे… सलमान खान की माँ, हिन्दू परिवार की  सलमा जी के अलावा घर में, अरबाज़ खान की बीवी बतौर मलाइका अरोरा रही हैं..बहन अलवीरा के पति अभिनेता अतुल अग्निहोत्री हैं… जिस बच्ची को फुटपाथ से लाकर घर में बेटी का दर्ज़ा देकर सलीम भाई ने नाज़ों से पाला, उसे अर्पिता नाम दिया और हिमाचल प्रदेश के एक मिनिस्टर के बेटे आयुष से उसकी शादी करवाई..

जावेद साहब के बेटे फरहान ने भी हिंदू लड़की से शादी की है..तो कैफ़ी आज़मी साहब के बेटे और शबाना जी के भाई.. सिनेमेटोग्राफर बाबा आज़मी की बीवी हैं अभिनेत्री उषा किरण की बेटी तन्वी किरण..

ऋतिक रोशन की एक्स वाइफ सुज़ैन, अभिनेता संजय खान की बेटी हैं..आमिर खान की पूर्व पत्नी सुनीता  और वर्तमान में किरण राव हैं…शाहरुख़ खान की पत्नी गौरी हैं… तो सैफ अली खान ने  अमृता सिंह से अलगाव के बाद करीना कपूर से शादी की.. नसीरुद्दीन शाह ने दीना पाठक जी की बेटी रत्ना पाठक को शरीके हयात बनाया..

आमिर के भांजे एक्टर इमरान खान की बीवी अवंतिका हैं …एक्टर ज़ाकिर हुसैन की बीवी हैं आर्टिस्ट सरिता जी ..अभिनेत्री और डांसर नीलिमा अज़ीम ने पंकज कपूर साहब से पहला विवाह किया था, शाहिद कपूर इन दोनों के बेटे हैं … राजेश खट्टर से नीलिमा जी का दूसरा विवाह हुआ… ईशान उनके बेटे हैं… अभिनेता मनोज बाजपेयी की पत्नी नेहा  मुस्लिम परिवार से हैं….

राजनीति से जुड़े कई लोगों ने भी जाति की दीवारों को ध्वस्त किया है…संजय गाँधी की टीम में रही रुखसाना सुल्तान ने कर्नल सिंह से ब्याह किया, एक्ट्रेस अमृता सिंह उनकी बेटी हैं….फ़ारूख़ अब्दुल्लाह के  परिवार में राजेश पायलट के बेटे सचिन दामाद बनकर गए उन्होंने सारा अब्दुल्लाह से शादी की..

ताज़्ज़ुब तो नज़रिये पर तब होता है, जब इन शादियों में ज्यादातर मुस्लिम पुरुष होने पर भी कुछ लोगों को एतराज़ होता है…इसे नाम भी दे डाला ‘लव जेहाद’…

वैसे अगर…लव जेहाद के ज़रिये.. दोनों धर्मो को आदर करने वाला इंसान पैदा होता है तो ये जेहाद कतई  गलत नहीं..

इश्क़, मोहब्बत किसी जेहाद से कम भी नहीं होते…

हालांकि  सुनील दत्त, किशोर कुमार, भारत भूषण…जैसे 50 नाम इसका जवाब हैं..महज इत्तिफ़ाक़ ही होगा कि लड़के मुस्लिम समुदाय के ज्यादा हैं..

सारांश यह की इन अंतर्सामुदायिक विवाह के बाद इन शख्सियतों के बच्चों को आप… इंसान ही मानेंगे ना..

हमारे आसपास भी, बारहों महीने रामलाल… बशीर भाई से रजाई गद्दे खरीदता है तो बशीर भाई रामलाल की दुकान से किराना लेते हैं…आयशा..अनिता के साथ दफ़्तर में लंच के दौरान टिफ़िन शेयर करती है…तो दोनों बस, लोकल ट्रेन में साथ साथ सुरक्षित सफ़र कर घर लौटती हैं… दीवाली और ईद की खरीददारी भी साथ करने से नहीं चूकती…. मेरे कैमरामैन इश्तियाक़ भाई…शूटिंग के बीच में जुम्मे की नमाज़ पढ़ने नियमित जाते हैं ..सहायक निर्देशक राजेश भाई … हर मंगलवार हनुमान जी के मंदिर एक ही टू व्हीलर पर जाया करते हैं..एक को मंदिर में प्रतीक्षा करने में एतराज़ नहीं दूसरे को मस्ज़िद में नमाज़ तक इंतज़ार करने से परहेज नहीं..

मेरे दोस्त राजा कबीर मेरे साथ मंदिर में माथा टेकने में गुरेज़ नहीं पालते…मैं ख्वाज़ा साहब के दरबार अज़मेर में चार बार सजदा कर आया… वहां के गद्दीनशीन डॉ. आफ़ाक़ उस्मानी मेरे अच्छे दोस्त हैं… समुन्दर के बीच हाजी अली साहब की दरग़ाह पर जाने का सौभाग्य मुझे मिला तो निजामुद्दीन औलिया साहब के दरबार में भी माथा टेका… जावरा की हुसैन टेकरी में हज़रत मोहम्मद साहब के पवित्र बालों को शीशे का ज़ार खोलकर मुझे दर्शन कराये गए…सामनेवाला किसी मज़बूरी में कट्टर रहे भी तो हमें अपने विवेक की सुनना हैं, ना कि बदले की भावना रखी जाये..

आये दिन मोदी जी को कोसने वालों को बताना चाहूंगा कि उनके अपने वडनगर में मैं अभी अभी उनके मुस्लिम समर्थकों, प्रसंशकों के बयान रिकॉर्ड करके आया हूं… बी जे पी में लीडर मुख़्तार अब्बास नक़वी साहब और शाहनवाज़ खान साहब से कई मुलाकातें की हैं… मंदिर – मस्ज़िद कहां बने… कौन यहाँ रहकर पाकिस्तान के गुणगान करता है… जैसी बातों से इतर और भी सैकड़ों मुद्दे हैं बातों के…

आखिर में बशीर बद्र साहब का एक शेर याद आ गया..

दुश्मनी का सफ़र .. एक कदम, दो कदम…

हम भी थक जायेंगे, तुम भी थक जाओगे..

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