–विजय बुधोलिया

रामलीला उत्तर-भारत में परम्परागत रूप से खेला जाने वाला राम के चरित पर आधारित नाटक है। यह प्राय: विजयादशमी  के अवसर पर खेला जाता है। लोक नाट्य के रूप में प्रचलित इस रामलीला का देश के विविध प्रांतों में अलग-अलग तरीकों से मंचन किया जाता है। समुद्र से लेकर हिमालय तक प्रख्यात रामलीला का आदि प्रवर्तक कौन है, इस बारे में कई मत हैं। एक किंवदंती का संकेत है कि त्रेतायुग में श्रीराम के वन जाने के बाद चौदह वर्ष की वियोगावधि अयोध्या-वासियों ने राम की बाल-लीलाओं का अभिनय कर बिताई थी। एक कथा के अनुसार अयोध्यावासियों द्वारा सीताजी के चरित्र पर लांछन लगाए जाने के कारण श्रीराम ने लोकनिन्दा से बचने के लिए सीताजी का त्याग कर दिया। जिस पर उन्होंने वाल्मीकि आश्रम में शरण ली। वहाँ उन्होंने लव व कुश को जन्म दिया।महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा देकर दक्ष बनाया। साथ ही उन्हें रामायण भी कंठस्थ कराई। उन्हें इस बात की पीड़ा थी कि अयोध्यावासियों ने निर्दोष सीता जी के चरित्र पर व्यर्थ लांछन लगाया। इसलिए एक बार अयोध्यावासियों को उनकी भूलों का बोध कराने के लिए वे अपनी समस्त शिष्यों के साथ अयोध्या गए। सरयू के किनारे बड़ा मंच बनवाया और अयोध्यावासियों को नाटक देखने का आमंत्रण दिया। उस नाटक में  उनके शिष्यों ने रामलीला का मंचन किया। उसमें विशेषकर माता सीता द्वारा लंका में बिताए दु:खपूर्ण दिनों,रावण वध के बाद ली गई उनकी अग्नि-परीक्षा,जिसमें वे निष्कलंक सिद्ध हुईं, इसके बावजूद अयोध्यावासियों द्वारा उनके चरित्र पर लगाए गए आरोप,जिसके कारण एक महारानी होने पर भी किस प्रकार वनवास में कठिन जीवन बिताना पड़ा,आदि मार्मिक प्रसंगों को दिखाया गया। इसे देखकर अयोध्या वाले रोने लगे और उन्हें अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। जिसके बाद उन्होंने निर्दोष सीताजी को वापस लाने की श्रीराम से प्रार्थना की।

आज हम रामलीला का जो रूप देखते हैं, जनश्रुति के अनुसार इसके आदि प्रवर्तक मेघा भगत थे। एक बार पुरुषोत्तम रामचन्द्रजी ने इन्हें स्वप्न में दर्शन देकर रामलीला करने का आदेश दिया ताकि भक्तजनों को भगवान् के चाक्षुष दर्शन हो सकें। इससे सत्प्रेरणा पाकर इन्होंने रामलीला सम्पन्न कराई। कुछ लोगों के मतानुसार रामलीला की अभिनय परम्परा के प्रतिष्ठापक गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन्होंने हिंदी में जनकल्याणकारी नाटकों का अभाव पाकर रामलीला शुरू कराई। इनकी प्रेरणा से अयोध्या और काशी के तुलसीघाट पर प्रथम बार रामलीला हुई थी।

किन्तु, रामलीला के विधिवत आयोजन का जो प्रामाणिक विवरण प्राप्त होता है, उसके अनुसार ईसवीं वर्ष 1783 में रामनगर में रामलीला की शुरुआत काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने की थी। तब से यह रामलीला आज भी उसी अंदाज़ में होती है। यही अंदाज़ इस रामलीला को अन्य रामलीला से अलग करता है। पूरा मंचन रामचरितमानस के आधार पर अवधी भाषा में होता है। खास बात यह है कि 233 साल पुरानी यह रामलीला आज भी पेट्रोमेक्स और मशाल की रोशनी में ही होती है। लीला देखने हजारों की भीड़ जुटती है, फिर भी किसी माइक का इस्तेमाल नहीं होता। बीच-बीच में ख़ास घटनाओं के वक़्त आतिशबाज़ी ज़रूर होती है। 

यही नहीं, इस रामलीला का एक और खासियत है जो कहीं देखने को नहीं मिलती। यह रामलीला किसी एक मंच पर नहीं होती। करीब चार किलोमीटर के दायरे में एक दर्जन कच्चे-पक्के मंचों को इसका मंचन होता है। इन मंचों को ही अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और रामबाग का रूप दिया जाता है।

रामलीला की तैयारी, इसकी शुरुआत और निर्देशन का काम मुख्य रूप से दो लोग करते हैं। एक पर मुख्य किरदारों की ज़िम्मेदारी होती है, जबकि दूसरे पर बाक़ी पात्रों की। रामचरित मानस की चौपाइयों पर कुल 27 किरदारों के लिए रामलीला में 12-14 बच्चे हिस्सा लेते हैं। सावन से ही रामलीला की तैयारी शुरू हो जाती है और मुख्य लीला भादों में अनंत चतुर्दशी के दिन रावण के जन्म के साथ लीला शुरू होकर आश्विन महीने की शुक्ल पूर्णिमा को ख़त्म होती है। यह लीला इकतीस दिनों तक चलती है।

रामलीला के दौरान परम्परा को निभाने के लिए रोज़ाना ‘काशी नरेश’ भी हाथी पर सवार होकर आते हैं और उनके आने के बाद ही रामलीला शुरू होती है। एक हाथ में पीढ़ा और दूसरे में रामचरित मानस की किताब लेकर यहां हर साल हज़ारों लोग रामलीला देखने आते हैं। पीढ़ा बैठने के लिए तो रामचरित मानस, लीला के दौरान पढ़ते रहने के लिए। एक तरफ लोग रामचरित मानस की चौपाइयां पढ़ते रहते हैं, दूसरी तरफ रामलीला संवाद के साथ आगे बढ़ती रहती है।

कृष्णपक्ष चतुर्थी को द्वितीय गणेश पूजन के साथ ही इसकी औपचारिक शुरूआत हो जाती है। रामलीला सकुशल पूर्ण होने के लिए हुए गणेश पूजन में पांचों पात्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुध्न और सीता की पूजा की जाती है। साथ ही रामायण की पोथी, हनुमान जी का मुखौटा, गणेश जी की मूर्ति का पूजन भी होता है।किन्तु,कोरोना के संक्रमण की वजह से इस वर्ष यह 233 साल पुरानी परम्परा टूट  गई है और इस बार रामलीला नहीं कराने का निर्णय लिया गया है।

( बुधोलिया रामकथा के अध्येता हैं।) 

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