प्रशांत रायचौधरी

सीधे-सीधे विषय पर आता हूं कि विश्व भूख सूचकांक में भारत फिसलता जा रहा है। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में देश 55 वे क्रम पर था जो उन्हीं के कार्यकाल में 80 वें क्रम तक फिसला। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ताजा स्थिति 94 वें क्रम की है। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो मनमोहन सिंह के समय भूखमरी 55 से 80 मतलब 25 क्रम ज्यादा फिसली जबकि मोदी के समय 80 से 94 अर्थात 14 क्रम फिसली। ओवरऑल कांग्रेस के समय 80 क्रम व भाजपा के समय 14 क्रम हम नीचे चले गए। भाजपा हो या कांग्रेस क्या दोनों ही एक ही थैली के चट्टे-बट्टे नहीं है। दोनों ही भौतिक साधन बढ़ाने पर ध्यान देते रहे व भूखमरी कम करने की ज्यादा कोशिश नहीं की।

देश में अपने बचाव में हर दिन कुतर्क गढ़े जाते हैं। रोटी के बदले चांद दिखाने की परपंरा है। अगर सरकार इसी सोच के साथ बढ़ती रही तो विश्वगुरू दूर की बात हम एक समान्य देश भी नहीं बन पाएंगे। क्योंकि एक भूखा समाज कभी समृद्ध व मजबूत देश नहीं बन सकता है। सरकार कोई भी हो उसे अपनी सोच बदलने की जरूरत है। लगता नहीं है कि वर्तमान सरकार का ध्यान इस ओर है भी।

भूखमरी सूचकांक में भारत शतक के करीब

नरेंद्र मोदी अच्छे दिन लाने की बात कहते हैं लेकिन हालत यह है कि भूखमरी सूचकांक में भारत शतक लगाने की ओर बढ़ रहा है। 2014 में जब मोदी ने सत्ता संभाली तब कहा जाता था कि देश खुशहाल होगा। छह साल बीत गए देश आर्थिक मामलों में पिछड़ता ही जा रहा है। हमारी जीडीपी की क्या हालत है यह किसी से छुपा नहीं है। देश की मीडिया जिन देशों को दिनभर कोसती रहती है वहां की स्थिति भारत से बेहतर है। मतलब ये कि वहां की सरकार अपने नागरिकों को पूरा ख्याल रख रही है। उन्हें भूखा मरने के लिए नहीं छोड़ रही है।अब सवाल यह है कि भारत के लोगों की प्राथमिकता क्या है। क्या भौतिक चकाचौंध में खोना ही समस्या का समाधान है या फिर वंचित वर्ग के लिए कुछ करते रहना पहली जरूरत है। भुखमरी को लेकर भाजपा सरकार की मंशा ही साफ नजर नहीं आती। सरकार की प्राथमिकता में गरीब, वंचित वर्ग नजर ही नहीं आता।इंटरनेशनल फूल पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा प्रकाशित एक पेपर के मुताबिक भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हर 4 व्यक्तियों में 3 को पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता। इसके लिए आप किसे दोषी ठहराएंगे? विशेषज्ञ मानते हैं कि खराब कार्यान्वयन प्रक्रिया, कुपोषण से निपटने का उदासीन रवैया व प्रभाव निगरानी में कमी इसकी वजह है। सरकार मंचों से भले भ्रष्टाचार मुक्त का दावा करे लेकिन हकीकत ये है कि उसके तमाम नेता इसी में लिप्त हैं। सरकारी मशीनरी पर उनका पूरा नियंत्रण है यही वजह है कि सारी योजनाएं कागजों पर ही रह जाती है।

एक बड़ा वर्ग बुनियादी जरूरत से महरूम

2001 से लेकर 2011 के बीच देश में ग्रामीण मजदूरी में इजाफा हुआ। लेकिन इस दौरान आहार की कीमतों में तेजी से इजाफा हुआ। भुखमरी से निपटने के लिए जो योजनाएं पहले चल रही थी उसी को आगे बढ़ाया गया है, ऐसी कोई भी प्रभावशाली योजना नहीं चलाई गई जो लोगों की जरूरत को पूरा कर सके। मनरेगा में मजदूरी बढ़ती मंहगाई के बीच उस गति से नहीं बढ़ाई गई जिस गति से जरूरत थी। यही वजह है कि एक बड़ा वर्ग बुनियादी जरूरत से महरूम हो जा रहा है।

कुतर्क से ढकने की कोशिश

भाजपा सरकार में एक प्रचलन तेजी से बढ़ा है, वह ये कि अगर कोई रिपोर्ट ये बताती है कि देश में भुखमरी की समस्या है, मानवाधिकारों की हालत खराब है, असहिष्णुता बढ़ रही है तो उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया जाता है। सरकार के लोग उसे अपने कुतर्क से ढकने की कोशिश करते रहते हैं। पिछले दिनों आपने देखा भारत में गाड़ियों की खरीद कम हुई तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, भारत के लोग ओला उबर से चलने लगे हैं इसलिए गाड़ियों की खरीद कम हो गई। ऐसा ही बयान प्याज के महंगा होने पर भी दिया था। ऐसे जवाब से बेसिक तथ्य दबा दिया गया कि लोगों की गाड़ी खरीदने की क्षमता कम हो गयी है। अब जब गाड़ियों की बिक्री 28 प्रतिशत बढ़ गई है तो निर्मला सीतारमण चुप्पी साधी हुई है।

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here