राजेश बादल
पाकिस्तान में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की सरकार दो बरस में ही इंटेंसिव केयर यूनिट में जाती दिखाई दे रही है।इमरान अपनी सियासत की सिल्वर जुबली मनाने की तैयारी कर ही रहे थे कि प्रतिपक्ष ने धावा बोल दिया।मुल्क़ के सारे सूबों में इमरान विरोधी बयार बह रही है।पंजाब और सिंध में सत्तारूढ़ दल के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त जन आंदोलन खड़ा हो गया है।विपक्ष का अगला पड़ाव अब बलूचिस्तान है।वहाँ पहले से ही इमरान-सेना के गठजोड़ के ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं।इससे पहले एक अपवाद को छोड़कर देश के इतिहास में हुक़ूमत के ख़िलाफ़ इस तरह का आंदोलन नहीं देखा गया।
पाकिस्तान की तवारीख़ में सिर्फ़ एक बार ऐसी स्थिति बनी थी,जब जनरल अयूब ख़ान के फ़ौजी शासन से ख़फ़ा अवाम ने उन्हें दिन में तारे दिखा दिए थे। जनरल अयूब को गद्दी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था।तब राष्ट्रपति मिर्ज़ा इस्कंदर ने जनरल अयूब को मुख्य सैनिक प्रशासक नियुक्त किया था। पद संभालने के बीस दिन बाद ही अयूब ने तख़्ता पलट कर दिया और मिर्ज़ा इस्कंदर को देश निकाला दे दिया।अयूब की नीतियों से जनता त्रस्त थी। उनके बेटे गौहर अयूब पिता के नाम पर खुले आम कमीशन लेते थे। भ्रष्टाचार का बोलबाला था।उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के लोकप्रिय नेता शेख़ मुजीबुर्रहमान को भारत से मिलकर पाकिस्तान का बँटवारा करने की साज़िश के आरोप में जेल में डाल दिया था। फिर भी किसी तरह लोग बर्दाश्त करते रहे। मगर जब मोहम्मद अली जिन्ना की बहन को जनरल अयूब ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में धाँधली से हराया तो लोग सड़कों पर उतर आए।हारकर अयूब को पद छोड़ने का ऐलान करना पड़ा।वह पाकिस्तान का पहला क़ामयाब जन आंदोलन था।
कमोबेश वैसे ही हाल से पाकिस्तान एक बार फिर गुज़र रहा है। जनरल अयूब ने ग्यारह साल के फ़ौजी शासन में फिर भी मुल्क़ में विकास की रफ़्तार बढ़ाई थी और आर्थिक तरक़्क़ी को नया रूप दिया था। पर, इमरान ख़ान तो यह भी नहीं कर पाए। दो साल में ही उनकी बंधी मुट्ठी खुल गई ।वे एक खोखले प्रधानमंत्री साबित हुए हैं।अयूब ने पाकिस्तान को अमेरिका की झोली में डाल दिया था तो इमरान ख़ान और उनकी सेना चीन की गोद में बैठे हुए हैं।अयूब ने विपक्ष के नेता शेख़ मुजीब को जेल में डाला था लेकिन इमरान तो इससे भी एक क़दम आगे निकल गए । उन्होंने नवाज़ शरीफ़, शाहबाज़ शरीफ़ , उनकी बेटी मरियम ,दामाद कैप्टन सफ़दर और पीपुल्स पार्टी के आसफ़ अली ज़रदारी समेत तमाम विरोधी नेताओं को सलाख़ों के पीछे कर दिया। देश के प्रतिष्ठित पत्रकारों – संपादकों और मीडिया समूहों से जुड़े आलोचक स्वरों को भी हवालात की हवा खानी पड़ी है। कुल मिलाकर एक बार फिर विराट जन आंदोलन मुल्क़ की सड़कों पर लहरा रहा है।
क्या ही दिलचस्प तथ्य है कि इस आंदोलन में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान नियाज़ी और उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी नवाज़ शरीफ़ हिन्दुस्तान के बहाने ग़द्दारी और देशभक्ति के मुद्दे को नए अंदाज़ में आम जनता के समक्ष परोस रहे हैं। इमरान ख़ान कहते हैं कि नवाज़ शरीफ़ भारत के संरक्षण में यह आंदोलन चला रहे हैं। उनका तर्क है कि भारत पाकिस्तान में स्थिर राजनीति और तरक़्क़ी नहीं देखना चाहता इसलिए ग़द्दारों को परदे के पीछे से मदद कर रहा है।ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए नवाज़शरीफ़ ने साफ़ तौर पर स्वीकार किया था कि कारगिल जंग पाकिस्तान ने ही छेड़ी थी और मुंबई धमाके भी पाकिस्तान की धरती से संचालित थे। इमरान ख़ान का कहना है कि नवाज़ मियाँ हिन्दुस्तान और नरेंद्र मोदी के चहेते हैं। वे सेना के ख़िलाफ़ हैं इसलिए हिन्दुस्तान से मिलकर ऐसे बयान देते हैं।इमरान अपने ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन को डाकुओं का आंदोलन बताते हैं।नवाज़ शरीफ़ पलटवार करते हुए इसका करारा उत्तर देते हैं । नवाज़ ने इमरान ख़ान के नाम में नियाज़ी जोड़कर कहा कि ढाका में हथियार तो नियाज़ी ने डाले थे ,लेकिन गद्दार नेताओं को कहा जाता है। पाकिस्तान के लिए ग़द्दार तो नियाज़ी हैं। आज के पाकिस्तान में देशभक्त वे लोग कहलाते हैं ,जो संविधान तोड़ते हैं और देश तोड़ते हैं। ज़ाहिर है नवाज़शरीफ का हमला इमरान और सेना – दोनों पर है। सन्दर्भ के तौर पर यहाँ बता दूँ कि इमरान ख़ान की जाति नियाज़ी है। जब 16 दिसंबर 1971 को लेफ्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल्ला ख़ान नियाज़ी ने अपनी सेना के साथ भारतीय जनरल जगजीत सिंह अरोरा के सामने हथियार डाले थे तो पाकिस्तान के लाखों लोगों ने शर्म के मारे तथा नियाज़ी को गद्दार मानते हुए अपने नामों के आगे से उपनाम की तरह लगा नियाज़ी हटा दिया था। ख़ुद इमरान ख़ान भी नियाज़ी नहीं लिखते। जब उन्हें कोई इमरान ख़ान नियाज़ी बोलता है तो वे आगबबूला हो जाते हैं।मौजूदा आंदोलन में नवाज़ शरीफ़ और समस्त विपक्ष इमरान ख़ान को नियाज़ी बताकर ही हमला बोल रहे हैं।
नवाज़ शरीफ़ के इस आक्रमण से इमरान तिलमिला उठे। उन्होंने कहा कि मियाँ नवाज़ के फ़ौज के ख़िलाफ़ बयान पर हिन्दुस्तान में ख़ुशियाँ मनाई जा रही हैं। इमरान ख़ान नियाज़ी के इस बयान का उत्तर विपक्षी गठबंधन के मुखिया मौलाना फज़लुर्रहमान ने दिया। उन्होंने कहा कि भारत में उस वक़्त ख़ुशियाँ मनाई गई थीं ,जब एक नक़ली प्रधानमंत्री मुल्क़ पर थोपा गया था।असल में इस आंदोलन में भारत कहीं न कहीं पाकिस्तानियों के अवचेतन में उपस्थित है। यह राहत की बात है। जब तक भारत वहाँ की अवाम के दिलों में धड़कता रहेगा ,मुल्क़ में जम्हूरियत की संभावनाएँ बनी रहेंगीं

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