-शिवकुमार विवेक

भोपाल. https://indiadateline.com अब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी कोरोना वैक्सीन मुफ़्त में देने की घोषणा कर दी है। तमिलनाडु में भी सरकार ने ऐसा ही ऐलान किया है। गुरुवार को बिहार में भाजपा द्वारा मुफ़्त में वैक्सीन बाँटने का वादा करने के तत्काल बाद इस तरह का प्रलोभन देने की होड़ लग गई है। 

हालांकि यह प्रलोभन है या झाँसा, यह अभी स्पष्ट नहीं है क्योंकि एक सूचना के अनुसार केन्द्र सरकार द्वारा स्वयं ही राज्य सरकारों को निःशुल्क वैक्सीन देने की योजना है। इसके लिए उसने 51 हजार करोड़ रुपए भी सुरक्षित रखे हैं। ब्लूमबर्ग के मुताबिक हर व्यक्ति पर टीके की मद में सरकार के 450-550 रुपए ख़र्च होने का अनुमान है। तब राज्य में मुफ़्त बाँटने की घोषणाएँ क्यों की जा रही हैं? क्या राज्य सरकारें इसे बेचने की फ़िराक़ में थीं (आख़िर स्वास्थ्य राज्य का विषय है।) जिसे अब निःशुल्क देने का ऐलान कर रही हैं? भाजपा के वादे के मुताबिक यदि बिहार में मुफ्त वैक्सीन दी जाएगी तो केन्द्र की हर आदमी को टीका उपलब्ध कराने की घोषणा क्या ज़ुबानी ख़र्च है? या सरकार मुफ़्त टीकाकरण के साथ दवाओं व अन्य सेवाओं की जो लागत आती है, उससे आम आदमी को राहत दे रही हैं अथवा निजी क्षेत्र से टीका लगवाने वालों का ख़र्च भी सरकार देगी? 

अभी यह कुछ भी स्पष्ट नहीं है, सिवाय लोक लुभावन घोषणा के। ऐसी घोषणाएं अभी और सरकारें भी कर सकती हैं क्योंकि सभी को जनहितैषी चेहरा ओढ़ने की जरूरत है। कई राज्यों में चुनाव आ रहे हैं। यदि तमिलनाडु आगामी चुनाव को देखते हुए इस होड़ में कूद रहा है तो दूसरे भी कूद सकते हैं। आख़िर यह इस समय का संवेदनशील मुद्दा है। यह रोटी-कपड़ा-मकान जैसी बुनियादी जरूरत की तरह है। बल्कि कह सकते हैं कि फिलवक्त कपड़ा-मकान से भी बड़ी जरूरत है और हर आदमी की निगाह इस पर टिकी है।

बिहार में भारतीय जनता पार्टी द्वारा चुनाव में मुफ़्त वैक्सीन देने का वादा करने की विरोधी दलों ने एक स्वर में आलोचना की है। भाजपा ने पहली बार कोई चीज़ मुफ़्त देने की महत्वाकांक्षी घोषणा की है। वरना वह इस मुफ़्त वाली दौड़ में नहीं रही। कांग्रेस में राहुल गांधी जरूर लोगों के खातों में पैसा डालने और क़र्ज़माफ़ी का पुरज़ोर वकालत करते रहे हैं। ज़ाहिर है कि विरोधी दलों का विरोध सिर्फ इस बात को लेकर है कि भाजपा ने ऐसा क्यों किया जिसे वे नहीं कर सके। 

मुफ़्तखोरी बौद्धिक और अर्थशास्त्रियों के बड़े वर्ग की आलोचना का मुद्दा भी है। इस समय महामारी से निपटने में दुनिया की कोशिशों को बारीकी देखने वालों की गंभीर आलोचना का विषय इसलिए है क्योंकि उन्हें आशंका है कि ऐसी घोषणाएँ स्वास्थ्य तंत्र की पूरी व्यवस्था को पटरी से उतार सकती हैं। बिहार में भाजपा का यह वादा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने सामने रखा । पहले ही दुबली हुई अर्थव्यवस्था के साथ उनकी सरकार इसे कैसे संभालेगी, यही देशवासियों को स्पष्ट नहीं है। 

http://indiadateline.comअभी हमारा स्वास्थ्य तंत्र कोरोना प्रबंधन में शिद्दत से जुटा हुआ है। उसकी ही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित पूरी दुनिया की सरकारों व स्वास्थ्य विशेषज्ञों व प्रबंधकों की चिंता का सबब वैक्सीन का ठीक से वितरण सुनिश्चित करना भी है। जिसका कारगर फ़ार्मूला अभी तैयार किया जाना है। जो देश अब तक पोलियो ड्रॉप और दूसरे टीकों की प्रभाविता के लिए दशकों से जूझ रहा हो, वहाँ चंद महीनों या साल के भीतर सबको बिना किसी अभाव, अराजकता अथवा कुप्रबंध के कोरोना वैक्सीन मिल जाएगी, यही अभी तय नहीं है। ऐसे में मुफ़्त बाँटने की घोषणा को मृगतृष्णा ही मानना चाहिए। और उक्त चुनौतियों व समस्याओं के आईने में विचार करें तो एक भयावह विचार।

 

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