सागर (मप्र). इंडिया डेटलाइन.  करोड़ों साल पहले भीमकाय जीव डायनासोर मध्यप्रदेश की नर्मदा घाटी में अंडे देने के लिए आते थे। यहाँ की रेतीली नम जमीन उनके लिए मुफ़ीद थी। धार जिले में बड़ी तादाद में अंडे व अन्य जीवाश्म मिलने के बाद अब मंडला से उनके सात अंडे मिले हैं। इनसे डायनासोर की नई प्रजाति मिलने की संभावना पर भी प्रकाश पड़ेगा। 

इन अंडों का परीक्षण कर डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के व्यावहारिक भूगर्भ विज्ञान विभाग के जीवाश्म विज्ञानी प्रोफेसर पीके कठल ने बताया है कि इन अंडों पर आगे का अध्ययन यह बताएगा कि ये डायनासोर किस प्रजाति के थे। ये अंडे मंडला के शिक्षक प्रशांत श्रीवास्तव को फरवरी 2020 में मोहनटोला क्षेत्र में एक तालाब की खुदाई के दौरान उसकी तलहटी में मिले थे। जिनमें प्रत्येक का वज़न ढाई किलो से ज्यादा (2.60 किलो) है और व्यास चालीस सेमी है। ये गोलाकार हैं। विभिन्न शोधों से पता चलता है कि मध्यप्रदेश में क़रीब 21 करोड़ साल पहले सबसे पहले डायनासोर का जीवन शुरू हुआ जिसे जुरासिक युग कहा जाता है। सबसे ताजा प्रमाण साढ़े छह करोड़ साल पहले के हैं। 

डॉ.कठल ने ‘इंडिया डेटलाइन’ को बताया कि ये लंबी गर्दन व छोटे सिर वाले वाले डायनासोर थे जिनकी लंबाई पैंतालीस फीट के ज्यादा थी और ये तृणभक्षी थे। इसकी वजह से इनका मुँह छोटा (लगभग चोंच जैसा)  होता था। देश में सबसे पहले डायनासोर के जीवाश्म कर्नल स्लीमैन को उन्नीसवीं सदी में जबलपुर छावनी से मिले थे। इसके बाद धार जिले में बड़ी तादाद में जीवाश्म मिले। कुक्षी की लम्हेटा घाटी से भी अंडे व अस्थियों के जीवाश्म मिले। धार में भी 2005-18 में डायनासोर प्रजनन क्षेत्र पाया गया।

धार जिले में डायनासोर सहित प्राक् इतिहास की खोज में लगे विजय वर्मा ने बताया कि डेढ़ दशक लंबी खोज में कई साइट्स मिलीं। उनके जैसे शोधकर्ताओं के समूह मंगल पंचायतन परिषद के प्रयासों ने दुनिया का ध्यान 2007 में तब खींचा जब पच्चीस साइट्स मिलीं। इन लोगों ने प्रागैतिहासिक अवशेषों को मांडू में अश्मधा जीवाश्म संग्रहालय स्थापित कर संरक्षित किया। जिसके बाद इंदौर के काला मंडल अभयारण्य में भी प्राकृतिक इतिहास से जुड़े साक्ष्यों को सहेजा गया। अब सरकार ने  बाग-कुक्षी क्षेत्र में 108 हेक्टेयर में राष्ट्रीय डायनासोर पार्क बनाने की योजना भी शुरू की है। 

डॉ. कठल के अनुसार जबलपुर में बारह -से पंद्रह साइट्स हैं जहाँ से डायनासोर के अवशेष मिले। आगे की खोज में यह एरिया बढ़ सकता है। ये सोरोपॉड ग्रुप के डायनासोर थे जो बड़े आकार के थे और इनके मुँह नुकीले थे। पाटबाबा मंदिर एरिया ५-६ नेस्ट मिले। एक नेस्ट में एक से लेकर कई अंडे होते हैं। यह पूछने पर कि नर्मदा घाटी में अंडे देने के लिए आने वाले डायनासोरों का आवास कहाँ था? डॉ. कठल का कहना है कि इस पर विस्तृत अनुसंधानों से प्रकाश पड़ेगा। वैसे पूरी नर्मदा घाटी जैव विविधता से भरी थी। नर्मदा तट पर रतौना से मानव के पूर्वज की खोपड़ी के अवशेष मिले थे। 

विजय वर्मा का कहना है कि नर्मदा से लेकर धार होकर गुजरात तक का क्षेत्र प्राकृतिक इतिहास के प्रारंभिक युग का साक्षी है। धार-झाबुआ से समुद्री जीवों के अवशेषों मिले हैं। इन्हें सहेजा गया है। बाद में डायनासोर की प्रजातियों के जीवाश्म बड़ी तादाद में प्राप्त हुए। बहुत से अवशेष लावा की दक्षिणी परत में दब गए। 

सुप्रसिद्ध पुरा वैज्ञानिक और बीरबल साहनी के भतीजे डॉ. अशोक साहनी का कहना है कि भारत में छह करोड़ साल पहले तक डायनासोर की पैंतीस से ज्यादा प्रजातियाँ थीं।

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