राकेश अचल

दीवाली के बाद चार माह से सोये पड़े देवता जागते हैं। कृपाकर आप भी उनके साथ जागें और इस जागरण का इस्तेमाल केवल शादी-विवाह के लिए ही न करें बल्कि इस देश को सजाने, संवारने में भी करें। सियासत के कान भी उमेठें।

लोजी, दीवाली मननी थी सो मन गई। धूमधाम से मन गई। धूम के साथ धड़ाके भी हुए, किसी ने न एनजीटी की सुनी न अदालत की, सरकारों की तो सुनता ही कौन है। देश के हर कोने में फुलझड़ियां,चकरियां,अनार चले और पटाखे फोड़े गए। सदियों की आदत एक दिन में,या एक आदेश से थोड़े ही बदल सकती है। बदल भी जाती यदि हमारी दिशानिर्देशक संस्थाओं ने इतना रसूख बना  लिया होता कि कोई उनकी अनसुनी न करता। 

पंजाब में पटाखों से पहली पराली जली,बाद में पटाखे चले। जनता का दिल तो पता नहीं कब से जल रहा है। दिल्ली और देश के तमाम हिस्से धुंआ-धुंआ हैं, लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों नहीं पड़ता ये हम नहीं जानते। हम तो इतना जानते हैं कि हम प्रतिस्पर्धी युग में हैं। पटाखें बंद करने से पहले हमारी शर्त होती है कि एनजीटी या अदालत या सरकार बकरीद पर बकरे कटवाना बंद कराए। हम सूखी होली भी इसीलिए नहीं खेलते क्योंकि सरकार हमारी बात नहीं सुनती। हमारे तीज-त्योहार अब होड़ में हैं।

हमें न पर्यावरण की चिंता है और न अपने स्वास्थ्य की। हमें चिंता है तो अपने धर्म की, हम चिंतित हैं तो अपने तीज-त्योहारों को लेकर। हम एक निशान,एक विधान चाहते हैं लेकिन न जाति से मुक्त होना चाहते हैं न धर्म से। कुनबों से मुक्त होना तो बहुत दूर की बात है। हम गिरगिट की तरह रंग बदलने  में माहिर लोग हैं। हम सब कुछ जानकर भी कुछ नहीं जानना चाहते। हमारी अक्ल पर पत्थर नहीं पड़े हैं बल्कि हमने अपनी अक्ल को पत्थरों के हवाले कर रखा है।

मुमकिन है कि आपने कभी इस बाबद न सोचा हो लेकिन हम जैसे फुरसतिये इस बारे में अक्सर सोचते रहते हैं,और सोच-सोचकर दुबले होते रहते हैं। देश के बारे में सोचना वैसे भी आसान काम नहीं है। वैसे ही हम आसान काम में हाथ नहीं डालते। हमें कठिन काम करना पसंद है। आसान काम तो कोई भी कर सकता है। देश के पर्यावरण, प्रकृति और संसाधनों को लूटने का काम नेता करते हैं और उन्हें दूषित करने का काम जनता। मगरमच्छी आंसू बहाने का काम हम लेखक कर देते हैं। इससे ज्यादा हमारे काबू में है ही क्या ?

दिवाली के एक रोज पहले हमारे ऊपर वाले फ्लोर में एक पड़ोसी की अकाल मौत हो गई। श हमें लगा कि चलिए कम से कम इसी बहाने से सन्नाटा रहेगा, लेकिन हम गलत सोचते थे। हमारे सिर के ऊपर वाले फ्लोर पर ही नहीं, पूरी बस्ती में खूब पटाखे-फुलझड़ियाँ चलीं। किसी को किसी की मौत से कोई फर्क नहीं पड़ा। हम समाज की हृदयहीनता के कायल हो गए हैं। हम जानते हैं कि जिसका मरता है वो ही रोता है। दूसरों को रोने की जरूरत नहीं है दूसरे अपना काम बाखूबी कर सकते हैं। 

प्रगति करते हुए हम सायबर युग में आ गए हैं। हमारी तमाम मानवीय सम्वेदनाएँ ‘ईमोजियों ‘में तब्दील हो गई हैं। हम उन्हीं से अपना काम चला रहे हैं। कितनी सुखद स्थिति है यह! हमारे आंसू,हमारी हंसी,हमारी प्रफुल्ल्ता,हमारा शोक, हमारी शुभकामनाएं,हमारी बधाइयाँ सबकी सब इमोजी में बदल गई हैं‌। अब हमें आंसू बहाने की जरूरत नहीं। किसी को अंक में भरकर सांत्वना देने की जरूरत नहीं, किसी को मिठाइयां भिजवाने की जरूरत नहीं,किसी के हाथ जोड़कर अभिवादन करने की जरूरत नहीं। जय हो,जय हो ! ईमोजियों की जय हो!!

आप सोच रहे होंगे कि पंडितजी आज खिसक गए हैं। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो गलत नहीं सोच रहे। मै सचमुच परेशां हूँ। आप मुझे खिसका हुआ कहकर कोई अपराध नहीं कर रहे। जब आप अदालत और एनजीटी के रोकने के बाद पटाखे चलने को अपराध नहीं मानते तो मुझे खिसका हुआ कहना अपराध कैसे हो सकता है भाई? आप मुझे ही नहीं, हर लिखने-पढ़ने वाले को खिसका हुआ कह सकते हैं। पढ़े-लिखों की जरूरत आज न समाज को है और न सियासत को। बिहार में नौवीं फेल लड़का देश के प्रधानमंत्री के लिए चुनौती खड़ा कर सकता है। आजकल डिग्रियों को देखता कौन हैं कि वे असली हैं या नकली! डिग्रियां भी आखिर आदमी बनाता है,चाहे जैसी बनवा लीजिए। 

बहरहाल अब देश में दीवाली भी निकल चुकी है और देश का दीवाला भी निकल चुका है। अब किसके निकलने की बारी है कोई नहीं जानता। जैसे दिवाला निकलता है वैसे ही दिल के गुबार निकलते हैं। कभी बिहार में तो कभी बंगाल में। गुबार निकलने के लिए देशकाल और परिस्थितियों की जरूरत नहीं होती। गुबार तो आप भर बैठे निकाल सकते हैं। जरूरी थोड़े ही है कि आपके पास दूरदर्शन,आकाशवाणी या टीवी चैनल ही हों। आप इंटरनेट पर जाकर किसी भी दूसरे प्लेटफार्म पर जाकर अपना गुबार निकाल सकते हैं। फिलहाल इस पर कोई रोक थोड़े ही है। 

आपकी आप जाने लेकिन मैं तो अपनी जानता हूं। जब तक गुबार न निकाल लूं, चाय नहीं पीता। मुझे चैन ही नहीं आता। आपको कैसे आ जाता है, यह आप जानें। बेचैन वक्ती बिना गुबार निकाले ज़िंदा रह ही नहीं सकता। जो गुबार नहीं निकाल रहा समझ लीजिए कि उसके भीतर कोई न कोई विकार पल रहा है। निरोगी रहने के लिए अपने भीतर का गुबार निकालिए। अगर आप गुबार नहीं निकालेंगे तो किसी दिन यह सरकार, यह समाज आपका जनाजा निकाल देगा। यह भी आपकी तरह ही बेदिल,बेरहम हो चुके हैं। मेरा काम तो सावधान करना है सो मै कर रहा हूँ। आप सावधान होना चाहते हैं या नहीं,ये आपका सर दर्द है,मेरा नहीं। मैंने तो अपना गुबार निकाल लिया। कल पटाखे न चलाकर भी एक तरह से मैंने अपना गुबार ही निकाला था‌। 

दीवाली के बाद चार माह से सोये पड़े देवता जागते हैं। कृपाकर आप भी उनके साथ जागें और इस जागरण का इस्तेमाल केवल शादी-विवाह के लिए ही न करें बल्कि इस देश को सजाने, सवारने में भी करें। सियासत के कान भी उमेठें। तभी जागने का कोई मतलब है।  हमें भगवान ने जानवरों से इतर अक्ल शायद इसीलिए दी है। अन्यथा वो हमें भी अक्ल की जगह दो पांव और दे देता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। आप भी इस हकीकत को समझिए कि आप चौपायों से बिलकुल भिन्न हैं। चौपायों की दुम केवल मख्खियां उड़ने या स्वामी के सामने हिलने के काम आती है, लेकिन आपकी अदृश्य दुम न जाने क्या-क्या काम करती है। 

(अचल वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं।)

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