मध्यप्रदेश के अग्रणी चित्रकार, सुलेखनकार,शिक्षक (स्व.)दिलीप चिंचालकर को कार्टूनिस्ट देवेंद्र ने इसप्रकार याद किया…

दिलीपजी ने और मैंने तकरीबन पन्द्रह साल नईदुनिया के एक छोटे से कक्ष में साथ बैठकर काम किया। सबसे ऊपरी मंज़िल पर लायब्रेरी के आखिर में स्थित उस कक्ष में अपना -अपना काम करते हुए हमने कितनी ही गर्मियां, सर्दियां, बरसातें ,त्योहार, चुनाव देखे। तो खट्टे मीठे पल भी जिए। काम के लिए ज़रूरी चुप्पियाँ , सन्नाटे और संगीत को ओढ़ पहनकर हिंदी के तब के सर्वश्रेष्ठ दैनिक अखबार की दैनिक अर्जेंसियों को सहज फुर्ती से अटेंड किया।

संगीत के शौक के कारण जब मैंने नॉवेल्टी मार्केट से लाकर एक छोटा सा ट्रांज़िस्टर रखा, वह जल्द ही हम दोनों की मधुर अनिवार्यता बन गया। कक्ष के सन्नाटे को मेंटेन करते हुए बेहद मंदी आवाज़ में गूंजते लता,रफ़ी, किशोर , मुकेश, आशा या जोहराबाई अम्बालेवाली के गीत उस कलाकक्ष को पूजास्थल की दिव्यता से भर देते थे। प्रेम गली जैसा संकरापन लिए उस कक्ष में दिलीपजी और मेरे अलावा किसी बाहरी तीसरे के, आ समाने के लिए एक फोल्डिंग कुर्सी मेरे पास रखी होती थी। यों तो वक़्त ज़रूरत वह कमरा अपने में चार या पांच लोगों को भी समो लेता था। उस कमरे में आया कोई भी अतिथि उनका या मेरा, अक्सर दोनों का ही परिचित होता था। तो चर्चाएँ भी मजबूरन या सहज रूप से कॉमन ही होती थीं। निजी चर्चा के लिए अपने अपने अतिथि को लेकर केंटीन की राह पकड़नी होती थी। अन्यथा चाय और कचोरी की बरसात तो एक फोन पर कभी भी हो जाती थी।

बेशक दिलीपजी मेरे लिए अग्रज समान थे। विशेष अवसरों पर मैं उनके चरण भी छूता रहा ,किंतु सखा भाव ही हमारा सार्वकालिक सहज भाव था।
हाँ तो संगीत, चाय और अतिथियों के अलावा हम लोग भुने चने, मूंगफली के दाने, भुट्टे, ककड़ियाँ , निजी समस्याएं और जोक्स भी शेयर करते रहे। गीत सुनाते सुनाते हमारा रेडियो ” सखी सहेली” प्रोग्राम सुनाने लगता था । तभी एक मज़ेदार घटना हुई।एक उद्घोषिका की मीठी आवाज़ हम दोनों को एक साथ भा गई। उस आवाज़ की स्वामिनी के आकार प्रकार को लेकर हमने एक मनोरम काल्पनिक मूर्ति बनाई थी।
अचानक एक दोपहर दिलीपजी ने कहीं से किसी मंचीय कार्यक्रम की तस्वीर लाकर दिखाई ।तस्वीर में एक परम् स्थूल महिला मूर्ति आकाशवाणी के किसी कार्यक्रम का संचालन कर रही थी। नीचे उसी उद्घोषिका का नाम लिखा हुआ था। ज़ाहिर है हम दोनों चितेरों की कल्पना छवि एक साथ चूर चूर हुई थी।
नईदुनिया छोड़कर जब मैं दुनिया देखने निकलने लगा, दिलीपजी बेहद भावुक हो गए । और हम देर तक लिपटकर आंसू बहाते रहे।
इंदौर वापसी के बाद अनायास ही एक अनोखा सिलसिला बन गया था। हम एक दूसरे के घर जाकर जन्मदिन की बधाई देने लगे। 8 जुलाई को मैं उनके दौलतखाने पहुँचता– 14 जुलाई को वे गरीबखाने तशरीफ़ लाते। भेंट में एक दूसरे को बड़े मजे से चने, मूंगफली, गज़क, राजगिरे के लड्डू दिए जाते। मगर एक बार 14 जुलाई को तो दिलीपजी ने हद ही कर दी। वे अपनी मोटरसाइकिल पर वह लम्बा चौड़ा टेबल लैंप ही बाँधकर बतौर तोहफा ले आए ,जिसे आदरणीय नरेन्द्र तिवारी जी ने मुझे भेंट किया था और जो मेरे पूरे नईदुनियावी कार्यकाल के दौरान मेज़ पर रखा मेरे नियमित काम को रोशन करता रहा था।
टेबल लैंप से मेरे विछोह को न जाने कैसे दिलीपजी ने महसूस किया और उसे अप्रयुक्त सामानों के ज़खीरे में से मेरे लिए निकल लाए थे। उस लैंप से बिखरती तिवारी जी की रोशनी में अब दिलीपजी की रोशनी भी शामिल है।
नईदुनिया में कार्यरत तीसरे चित्रकार थे वरिष्ठ सौम्य मूर्ति देवकृष्ण लांबोले जी।
दिलीपजी बेहद परिश्रम और बारीकी से
रविवारीय कहानी के चित्र तैयार करते थे। गुरुजी से मिली कला और सम्पर्कों की विरासत को उन्होंने लगन और मेहनत से साधा-संभाला था। फाइन आर्ट के मेधावी छात्र रह चुके लांबोलेजी फुर्ती से नयनाभिराम व्यक्तिचित्र और कंपोज़िशन बनाने में सिद्धहस्त रहे। और अपने राम औघड़ कार्टूनिस्ट।
दिलीप, देवकृष्ण और देवेंद्र के संयुक्त योगदान को नईदुनिया में “थ्री डी इफ़ेक्ट” भी कहा जाता था।
दिलीपजी के काम और यादों का खूब सारा इफेक्ट सदा उनके चाहने वालों को सदा महसूस होता रहेगा।

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