शिवकुमार विवेक. इंडिया डेटलाइन.  क्या किसानों के भारत बंद के जरिए केन्द्र सरकार अपने खिलाफ उठी विरोध की लहरों के उफान को मापना चाहती है, जिसके आधार पर ही वह तीन कृषि क़ानूनों पर आगे का फैसला करेगी? या वह इस बंद से एकदम बेपरवाह है क्योंकि उसका मानना है कि यह किसानों की आड़ में उसके विरोधियों का खेल है अथवा केवल पंजाब-हरियाणा के किसानों का मामला है। 

ये प्रश्न किसानों के आंदोलन के प्रति केंद्र सरकार द्वारा अपनाए गए रवैये से उठ रहे हैं। यदि इनके उत्तर खोजे जाएँ तो वास्तव में सवाल में ही जवाब निहित हैं। किसानों ने पांच दौर की वार्ताओं के बाद सरकार को अपने पक्ष में झुकाने के लिए छठवें दौर की बातचीत के पहले ही देशबंद जैसा क़दम उठा दिया। यह केन्द्र पर दवाब बनाने की रणनीति है लेकिन केन्द्र की सरकार में बैठे कई नेता मानते हैं कि यह अवांछित और मनमाना क़दम है। केन्द्र की भारतीय जनता पार्टी शासित सरकार इस विरोध को केवल किसानों तक सीमित नहीं मानती बल्कि वह इसके पीछे राजनीतिक इरादों को भाँप रही है। सत्तापक्ष के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि किसान वास्तव में समाधान चाहते हैं तो उनके लिए सरकार ने बातचीत के द्वार खोले हैं, उसमें हासिल नहीं होने के बाद वे कोई क़दम उठाने के लिए स्वतंत्र थे। इससे वे सरकार की सदाशयता पाते, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करते व अवांछित दवाबों व राजनीतिक मंशाओं से मुक्त होने की छवि बनाते। 

यह किसी से छुपा नहीं है कि किसान आंदोलन के पीछे राजनीतिक मंशा है। यह भी ज़ाहिर है कि जिस पंजाब से आंदोलन की ज्वालाएँ भभकीं, वहाँ कांग्रेस की सरकार व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का खुला समर्थन प्राप्त है। इसे बाद में देशव्यापी स्वरूप दिया गया जिसमें कांग्रेस सहित तमाम मोदी विरोधी दल आकर जुड़ गए। यदि किसान संगठनों की इन घोषणाओं पर भरोसा करें कि यह शुद्ध रूप से किसानों का आंदोलन है तो उन्हें राजनीतिक दलों को परे रखना चाहिए था। खुले मंच से साफ-साफ़ यह ऐलान करना चाहिए था कि उनका उनसे कोई सरोकार नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और भारत बंद राजनीतिक दलों का बंद होकर रह गया। राजनीतिक दल ही नहीं, शाहीन बाग और अन्य इसी तरह के संगठन व नेता जिनका किसानों से कोई लेना-देना नही है, इस आंदोलन के बहाने सक्रिय हो गए। इसका आम आदमी के लिए संदेश यह गया कि यह मोदी को घेरने की चाल भर है। 

सूत्र कहते हैं कि केन्द्र सरकार यही देखना चाहती है। इसलिए उसने भारत बंद जैसे बड़े क़दम को उठने दिया और उसके आगे तत्काल झुकने से इंकार कर दिया। वह देखना चाहती है कि यह पंजाब-हरियाणा से बाहर कितना प्रभाव डाल रहा है और किसानों तक कितना केन्द्रित रहता है? स्पष्ट हो गया है कि सरकार तीनों क़ानूनों को आसानी से छोड़ने वाली नहीं है। इसलिए वह यह देखना चाहती है कि उसे झुकना पड़ा तो कितना झुकना होगा। किसान प्रारंभ में केवल समर्थन मूल्य की गारंटी की चाहते थे केंद्र सरकार उससे सहमत हो सकती थी लेकिन राजनीतिक दलों के प्रभाव में वे तीनों क़ानूनों को पूरी तरह वापस लेने की माँग पर अड़ गए जो मोदी सरकार के लिए सहज स्वीकार्य व संभव नहीं है। क़ानूनों की वापसी में की माँग में वह राजनीतिक मंशा देखती है लिहाजा राजनीतिक तौर-तरीक़े से निपट रही है। 

विपक्षी दलों को जोड़ने से किसान आंदोलन के सामने विश्वसनीयता का संकट इसलिए भी खड़ा हो जाता है क्योंकि इनमें से ज्यादातर किसी न किसी रूप में और किसी न किसी मौके पर इन नए क़ानूनों के प्रावधानों की वकालत कर चुके हैं। इसलिए उनका ताजा विरोध प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को परेशान करने के अलावा कुछ नहीं है। यह भी तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि इसमें बड़े किसानों के हित ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं इसलिए आंदोलन को हवा देने में वे आगे हैं। समर्थन मूल्य का फ़ायदा लेने वाले कुल किसानों का चौथा-पाँचवा हिस्सा होते हैं। छोटे किसान के पास इतनी उत्पादक क्षमता ही नहीं है कि वह अपनी फसल को मंडी में ले जाकरसमर्थन मूल्य का फ़ायदा ले सके। उसकी खेती को भी लाभदायक बनाने के रास्ते नया कानून सुझाता है। खेती पर आयकर से छूट का लाभ भी बड़े किसान लेते हैं। 

तो सरकार देखना चाहती है कि किसान कितने ज़िद्दी हैं और कितने किसान वास्तव में नए कानून की मुख़ालफ़त कर रहे हैं। वह इसके बहाने एकजुट होने की कोशिश कर रहे विपक्ष का चेहरा उघाड़ना चाहती है जिससे लोगों को स्पष्ट हो जाए कि किसानों की आड़ में वे क्या खेल खेल रहे थे। जैसा हाथरस कांड में हुआ। हालांकि इससे किसान आंदोलन की छवि भी खराब हो जाएगी। लेकिन यह आंदोलन के अगुवा किसान नेताओं को सोचने का विषय है। सरकार के सयाने यह भी देख ही रहे होंगे कि इस आंदोलन ने घर बैठकर आराम फ़रमाने वाले विपक्षी नेताओं को जमीन पर आने का मौक़ा दे दिया है। 

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