-शिवकुमार विवेक 

-शिवकुमार विवेक 
आजादी की कई कहानियाँ बहुत प्रेरक हैं और हमें यह बताती हैं कि हम आज स्वतंत्रता व स्वाधीनता के जिस वातावरण में जी रहे हैं, उसके पीछे कितने लोगों का संघर्ष और बलिदान निहित है। लेकिन दुर्भाग्य से बहुत लोग, खासतौर पर नई पीढ़ी इससे अनजान है। राष्ट्रीय संघर्ष से तो किसी तरह पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से कुछ परिचय मिल जाता है (संपूर्ण नहीं क्योंकि उनमें भी कई प्रमुख प्रसंग और महान गाथाएँ गायब हैं।) किन्तु स्थानीय इतिहास हमारी पहुँच से परे हो गया है। इन पर पर्याप्त शोध नही हुआ या इनका विवरण पुस्तकालयों में कैद हो गया। एक साल बाद जब आजादी के 75 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, तब इतिहास के ऐसे गौरवशाली प्रसंग आम जनता के सामने आएँ, यह प्रयास किया जाना चाहिए। 

हाल में मेरे हाथ में आई ‘बुंदेलखंड की वीरांगनाओं का शौर्य’ पुस्तक ऐसा ही एक प्रयास है। भारतीय शिक्षण मंडल महिला प्रकल्प महाकौशल प्रांत द्वारा प्रकाशित इस लेख संग्रह का संपादन डॉ. सरोज गुप्ता, शशि दीक्षित व पुष्पलता पांडेय ने किया है और सभी लेख महिलाओं ने लिखे हैं। यह सागर से लेकर उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र तक विस्तीर्ण गाथाओं को समेटती है। अधिकतर कहानियाँ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की हैं तो कई बाद के आंदोलन की। इस ई-बुक से बुंदेलखंड के पाठकों को अपने स्वातंत्र्य योद्धाओं के पुनर्स्मरण का अवसर मिलेगा। लेकिन इसका कमजोर पक्ष यह है कि इसमें शोध नहीं है। जो मोटी जानकारियाँ प्रकाशित होती रही हैं या सहज उपलब्ध हैं, उन्हें ही फिर संकलित किया गया। आज विकीपीडिया और गूगल से अलग जाकर लाने की चुनौती है। जो इंटरनेट में उपलब्ध है, वह तब तक आम आदमी के लिए नया होता था जब तक कि उसके हाथ में स्मार्ट फोन नहीं था और जियो जैसा सस्ता डेटा नहीं मिलता था। अब यह स्थिति है कि गूगल में ऊदाबाई टाइप करते ही ऊदाबाई पासी की पूरी कहानी ही नहीं आ जाती, उनके अवदान को चुनावी जातिगत राजनीति में भुनाने की कोशिशों की खबरें भी आ जाती है। ऐसे में फ़ौरी जानकारी सुशिक्षित या अध्येता पाठक को उबाती है और लेखक के कृतित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिये उकसाती है।

सतही संदर्भों के कारण यह पाठ्यपुस्तक जैसी बन गई है। नई जानकारियाँ नहीं देती लेकिन तब भी जनशिक्षण की दृष्टि से उपादेय है। यदि इस प्रयास को और गहराई तक ले जाते तो ऐसे क़िस्से भी मिलते जिसे आम व्यक्ति कम परिचित है या अपरिचित है। जो इतिहास की परतों में दबे हैं या जिन पर वांछित शोध नहीं हुआ। जैसे राजा पारीछत की रानी रासो की कहानी। ऐसी गाथाओं के संदर्भ जुटाने की पूरी परियोजना लेनी चाहिए। वीरांगनाओं पर जिस तरह महिला प्रकल्प ने काम किया, वैसे अलग-अलग समूह अलग-अलग विषयों पर काम कर सकते हैं। आजादी के कई अनाम नायक हमारे संज्ञान से दूर हैं। 
बुंदेलखंड की धरती पर आजादी की पहली लड़ाई की छोटी-मोटी नहीं, लंबी गाथा है जिसमें हर वर्ग के उत्सर्ग की विकट और विदारक घटनाएँ हैं। कुछ दर्ज हैं और कुछ को दस्तावेज़ों में विधिवत रूप से समेटने की जरूरत है। इतिहास को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि बुंदेलखंड की ज्यादातर लड़ाई रानी लक्ष्मीबाई के इर्द-गिर्द घूमती है। उनके नायकत्व में या उससे प्रेरित होकर खासतौर पर महिलाएं इस संघर्ष में कूद रहीं थीं। रियासतें भी उनसे जुड़ीं या उन्होंने संपर्क साधे। वीरांगनाओं में उनके दुर्गा दल की महिलाओं के बलिदान की लंबी श्रंखला दिखती है और गौर करने की बात है कि उनकी सहनायिकाएं पिछड़ी जाति से आती थीं जिनमें से कुछ के चरित्र को प्रस्तुत पुस्तक में समेटा है। 
प्रस्तुत पुस्तक में कुल बत्तीस लेख हैं जिनमें चौदह वीरांगनाओं पर लेख लिखे गए हैं। इनमें रानी ल़क्ष्मीबाई, दुर्गावती, अवंतीबाई लोधी, झलकारी बाई कोरी की जानी-मानी कहानियाँ हैं और इन्हें एक से ज्यादा लेखिकाओं ने लिखा जिससे दोहराव है। कानपुर की तवायफ़ अज़ीज़न बाई पर दो लेख हैं। मीरा सोनी ने लिखा कि उन्होंने ‘मस्ताना’ टीम बनाई जिसे तात्या टोपे ने प्रशिक्षण दिया।उन्हें अंगरेज सरकार ने पकड़ लिया था। उन्हे जब तोप से उड़ाया जा रहा था तब उन्होंने आसमान की ओर देखकर कहा कि ‘या खुदा फिर इस सरज़मीं पर जन्म देना।’ बेगम हज़रत महल पर लिखने के लिए बहुत है लेकिन इसमें ऊपरी जानकारी दी गई है।
1857 की वीरांगना ऊदा देवी पासी समुदाय की स्वतंत्रता सेनानी थीं जो पेड़ पर चढ़कर गोलियाँ दाग रही थीं। पेड़ काटने पर ही अंगरेज समझ पाए कि उस पर बैठकर गोली चलाने वाली महिला थी, पुरुष नहीं, जैसा कि समझ रहे थे। संध्या दरे ने मालती बाई लोधी के बारे में बताया जो रानी लक्ष्मीबाई की विश्वास पात्र थीं। जब रानी का घोड़ा आहत होकर गिरा तब सामने अड़कर गोली खाई। इनके बारे में कम जानकारी मिल सकी। सरस्वती बाई लोधी भी कम जानी जाती हैं।  इनके बारे में शोभा सराफ ने बताया कि वे बहुत खूबसूरत थीं और एक अंगरेज अधिकारी थौरन्टन की उन पर बुरी नजर पड़ने के बाद उनका अंगरेजों से शत्रु भाव पैदा हुआ। उनके पिता को मौत के घाट उतारने और पति सहित 1360 बाग़ियों को बंदी बनाने के बाद वे पूरी तरह अंगरेजों के खिलाफ कूद गईं और 1857 के संघर्ष का हिस्सा बनीं। थौरन्टन ने उनसे विवाह करने पर पति व बाग़ियों को छोड़ने की शर्त रखी। स्वदेश की ख़ातिर सरस्वती ने शर्त तो स्वीकार की लेकिन विवाह होते ही हीरा खाकर आत्महत्या कर ली। 
असगरी बाई को हम ध्रुपद गायिका के रूप में जानते हैं। डॉ. मेजर विभा श्रीवास्तव ने बताया कि उन्होने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था। उनके स्वातंत्र्य योगदान के बारे में एक वाक्य की जानकारी ही है। 
विजयलक्ष्मी दुबे ने लिखा कि सागर की कमला बाई बड़ोन्या को बिलासपुर में गांधीजी के भाषण ने प्रभावित किया। पति गोविंद प्रसाद बड़ोन्या की1942 में गिरफ़्तारी के बाद कमलाबाई ने महिलाओं का जुलूस निकाला और कोतवाली के सामने गिरफ़्तारी दी। शांता पाठक के बारे में भी भी विजयलक्ष्मी ने बताया जिन्होंने 1942 के आंदोलन में भाग लिया और सोलह वर्ष की अवस्था से ही स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। कई बार गिरफ़्तारी दी। 
ऋचा शाह ने सहोद्रा बाई राय के गोवा सत्याग्रह के बारे में बताया जो जाना माना वृत्त है।15 अगस्त 1955 को उन्होंने गोली से मरते एक सेनानी के हाथ से राष्ट्रीय झंडा थाम लिया था। 
आँचल गुप्ता ने झाँसी की रानी की भतीजी महारानी तपस्विनी के बारे में रोचक जानकारी दी है। वे बेलूर के ज़मींदार नारायण राव की बेटी थीं। बाल विधवा थीं। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने दुर्ग संभाला।अंगरेजों ने नज़रबंद किया। संन्यासिन समझकर छोड़ दिया। 1857 की लड़ाई में भाग लिया। क्रांति की विफलता के बाद तिरुचिरापल्ली जेल में रखा गया। नाना साहब के साथ वेश बदलकर नेपाल चली गईं। वहीं से अलख जगाती रहीं। नेपाल के सेनापति की मदद से गोलाबारूद का कारख़ाना खोला। 1905 में बंगाल विभाजन के खिलाफ सक्रिय रहीं। 
मोतीबाई के बारे में प्रीति शर्मा बताती हैं कि वे रानी लक्ष्मीबाई की सेना में जासूसी करती थीं। वृंदावन लाल वर्मा के मुताबिक वेश्या की बेटी थीं। अंगरेज सैनिक की गोली से उनकी मौत हुई। शीलादेवी पर स्नेहलता जैन ने बताया जो बाँदा की रहने वाली थीं और हरबोलों के मुँह से गाथाएँ सुनकर उन्हें प्रेरणा मिली। उन्होंने महिलाओं की पल्टन बनाई। गोकशी के खिलाफ जनआंदोलन खड़ा किया। 6 अगस्त 1842 में हज़ारों लोगों का जुलूस निकाला और मऊ तहसील घेरी। अंगरेज जान बचाकर भागे। 
शांभवी शुक्ला मिश्रा ने सागर में बालिका शिक्षा का प्रसार करने वाली यमुनाबाई व कमलाबाई  पर प्रकाश डाला है तो कविता शुक्ला ने बबेरू बाँदा की अनुसुइया व बाँदा की ही गोदिन शर्मा, पार्वती बाई, व गुलयारी के साथ-साथ महोबा,  हमीरपुर,  पाटन की प्यारी बाई ठकुराइन, जबलपुर की केतकी बाई,  प्रभावती नामदेव, नीलीबाई जैसे अल्पज्ञात चरित्रों के बारे में बताया। बेहतर होता कि पुस्तक को दो खंडों में संकलित किया जाता- एक प्रथम स्वतंत्रता संग्राम व दो 1857 के बाद का संघर्ष। एक ही चरित्र पर लिखे गए एक से ज्यादा आलेखों को एक साथ लाना चाहिए और दोहराव खत्म करना चाहिए था। मेरा सुझाव है कि आगे इस तरह के प्रयास में शोध और नई जानकारियों व अनाम व अज्ञात नायक-नायिकाओं पर काम किया जाना उपयोगी होगा। 
(लेखक भोपाल स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here