राकेश अचल

भारतीय पुलिस सेवा के 1990 बैच के अधिकारी सैयद मोहम्मद अफजल का ब्रेन ट्यूमर से अलीगढ़ में  मंगलवार को निधन हो गया। वे अपने नाम के अनुरूप अफजल अर्थात श्रेष्ठ थे। पुलिस की नौकरी उन्हें रास नहीं आती थी। वे बार-बार एएमयू को याद करते थे। उनके अग्रज भी उन्हीं की तरह शिक्षाविद थे। वे भी यदि भापुसे में न आते तो शायद एएमयू के बड़े शिक्षाविद होते। अफजल के असमय जाने से मध्यप्रदेश की पुलिस के साथ ही दोस्तों की दुनिया का एक बड़ा नुक्सान हुआ है। 

पत्रकारिता एक ऐसा क्षेत्र है जिस्मने आपको सभी तरह के लोग मिलते हैं,अच्छे भी,बुरे भी लेकिन याद वे ही रह जाते हैं जो सचमुच सबसे अलग होते हैं। भारतीय पुलिस सेवा के ऐसे ही अफसर थे सैयद मोहम्मद अफजल। भापुसे के सैकड़ों अधिकारियों से मेरा साबका रहा, लेकिन अफजल इनमें सबसे अलग रहे। वे मेरे निकटतम पड़ोसी थे, इसलिए उन्हें जानने-समझने का मौक़ा मुझे औरों से ज्यादा मिला। 

बात तीन दशक पुरानी है। ग्वालियर में मैं जिस सरकारी मकान में रहता था उसके नीचे के भवन में अफजल रहने आए थे। परिवीक्षाधीन अधिकारी के रूप में। घर के सामान के नाम पर एक पलंग, कुछ बर्तन  और एक-दो कुर्सियां। गोल-मटोल अफजल में एक चुलबुलापन था। पुलिस के एक कनिष्ठ अधिकारी का पड़ोस में आना खलल डालने वाला हो सकता था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अफजल कुछ ही दिनों बाद अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ रहने आ गए। 

अफजल में पब्लिक रिलेशन की अद्भुद क्षमता थी, यह मैंने तब जाना जब उन्होंने बातों-बातों में मेरे परिवार से घरोबा कायम कर लिया। हमारी कॉलोनी में कहने को एक दर्जन लोग रहते थे लेकिन मैं सबसे निकट का पड़ोसी था सो मेरे परिवार से उनकी निकटता स्वाभाविक थी। ऊपर से मैं एक नामचीन पत्रकार जो ठहरा। मेरे कथित रसूख के बारे में अफजल ने पहले ही पता कर लिया था सो उन्हें मुझसे सहज होने में और सहूलियत हुई। मैं पत्रकार, ऊपर से साहित्यप्रेमी। अफजल के लिए ये काफी था क्योंकि उनकी भी लगभग यही रुचियाँ थीं। 

एक-दो महीने गुजरे तो अफजल ने पूछ-‘भाई साहब नॉनवेज चलता है?’ मैंने  ‘हाँ ‘ क्या कहा, अगले दिन से सुबह या शाम एक प्लेट मेरे लिए नीचे से ऊपर आने लगी। अफजल को खाने-खिलाने का भारी शौक था और इसी शौक ने उनका वजन 110 किलोग्राम तक पहुंचा दिया था। उनके घर में चाहे दाल बने,चाहे सब्जी लेकिन सबमें एक टुकड़ा सामिष जरूर होता था। उनदिनों में सामिष भोजन करता जरूर था लेकिन घर पर नहीं, लेकिन अफजल का मन रखने के लिए उनके भेजे सामिष भोजन को कभी वापस नहीं लौटाया। मेरे लिए भेजी गई प्लेट को मेरी पालतू श्वान रोमा चट कर जाती।छह माह में उसका वजन भी अफजल से टक्कर लेने लगा। 

अफजल को गाने, खेलने, तैरने, निशानेबाजी और शायरी का भारी शौक था। वे पूरी लेन के बच्चों को घेरकर पुलिया पर बैठकर गाने लग जाते।  मन्ना डे के गाने उन्हें बेहद प्रिय थे। वे बच्चों को  ‘दिल की बात कहे दिल वाला’ ऐसे मस्त होकर सुनाते कि बस पूछिए मत। मेरे बेटे अतुल से तो उनकी बेहद पटती थी। अस्थाई तौर पर अतुल उनके परिवार का सदस्य हो गया था। अफजल जिस धर्म से आते थे उसमें श्वानों का स्पर्श वर्जित है। एक बार दीपावली को हमारी रोमा पटाखों के शोर से भयभीत होकर लापता हो गई।  हम सबने आधीरात तक उसकी खोजबीन की और थक-हारकर बैठ गए। रात को कोई तीन बजे कालबेल बजी, बाहर आए तो देखा कि अफजल की पलटन हमारी रोमा को साथ लिए खड़ी है। रात्रिगश्त से लौट रहे अफजल को रोमा घर से तीन किलोमीटर दूर सहमी सी दिखाई दी  तो उन्होंने फट से उसे अपनी कार में बैठा लिया।

अफजल की पत्नी राजदा बेहद सीधी युवती हैं, लेकिन  सलीकेदार। अफजल उन्हें बहुत चाहते थे। दोनों के परिवार और शिक्षा-दीक्षा में काफी फर्क था लेकिन अफजल ने इसे कभी जाहिर नहीं होने दिया। अफजल ने उत्तरप्रदेश हाईस्कूल बोर्ड से परीक्षा पास करने के बाद बीए,एलएलबी और एलएलएम तक की शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से थी। यहां के संस्कार उनकी रग-रग में थे। भापुसे की सेवा में 1990 में आने के बाद भी शायद इसीलिए दो बार इस विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार बनकर गए। देश के नामचीन शायरों के कलाम अफजल को कंठस्थ थे और चुटकलेबाजी में तो वे सिद्धहस्त थे ही। आप उनके पास बैठकर बोर तो हो ही नहीं सकते थे। उन्होंने मुझे भी गजल और नज्म की बारीकियां समझाईं थीं।

बेहट से परिवीक्षा अवधि समाप्त होने के बाद उनकी पहली पदस्थापना डबरा में हुई। वे वहां भी देखते-देखते लोकप्रिय हो गए। अफजल सबका ख्याल रखने वालों में से थे।  वे पक्के मुसलमान थे लेकिन प्रगतिशील मुसलमान। उन्हें भगवान राम के इतने भजन कंठस्थ थे कि किसी हिन्दू को नहीं हो सकते। वे अक्सर टेकनपुर से मेरे लिए डाक्टर ब्रांडी लेकर आते थे। कहते -‘भाई साहब शराब पीने के बजाय आप ब्रांडी का सेवन किया कीजिए। ग्वालियर की पदस्थापना के दौरान उन्हें स्थानीय मुस्लिम नेताओं ने घेरने की तमाम कोशिशें की लेकिन  वे सबसे मिलकर भी एक फासला बनाए रहे। 

ग्वालियर से जाने के पहले ही वे डबरा में पिता बने। उनका पहला बच्चा हुआ तो उन्होंने हम सबको ग्वालियर से डबरा खास तौर पर बुलाया। वे राजगढ़ और छतरपुर के एसपी रहे। फिर एसएएफ ने उन्हें जम्मू-कश्मीर भेज दिया और तीस वर्ष की नौकरी में वे लौटकर ग्वालियर दो बार आए। एक बार एसपी बनकर और दूसरी बार शायद डीआईजी या आईजी बनकर। वे एडिशनल डीजी थे। राजनीति से उनका कोई ख़ास साबका नहीं था लेकिन हर सत्तारूढ़ दल में उनकी पैठ थी, प्रशंसक  थे। ग्वालियर में वे नगर निगम के तरणताल में सपरिवार मिला करते थे। हमारी नातिन नयोनिका से उनका विशेष लगाव था। वे उसे खुद कई बार तैराकी के गुर सिखाते थे। तरक्की के बाद सहजता उन्होंने कभी छोड़ी नहीं। वे महफ़िलों के लुटेरे थे। 

पिछले साल अचानक जब मस्तिष्क  में अशुद्ध ग्रंथि का पता चला, तब भी वे घबराए नहीं। अचानक आई मूर्छा के बाद जब वे वापस सचेत हुए तो पहले की तरह मुस्कराते दिखे, लेकिन लगता है कि रोग उनके पीछे ही पड़ गया और अपने साथ लेकर ही गया। पुलिस में सराहनीय सेवाओं और वीरता के लिए राष्ट्रपति के पदक मिले तो वे काफी खुश थे, लेकिन पुलिस की नौकरी उन्हें रास नहीं आती थी। वे बार-बार एएमयू को याद करते थे। उनके अग्रज भी उन्हीं की तरह शिक्षाविद थे। वे भी यदि भापुसे में न आते तो शायद एएमयू के बड़े शिक्षाविद होते। अफजल के असमय जाने से मध्यप्रदेश की पुलिस के साथ ही दोस्तों की दुनिया का एक बड़ा नुक्सान हुआ है। मैं अफजल की सद्गति और आत्मशांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ। विनम्र श्रद्धांजलि।

(अचल मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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