राशिद किदवई

136 साल समकालीन इतिहास में बड़ा समय होता है। ब्रिटेन की कंज़रवेटिव व अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी की तरह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस वो लंबे राजनीतिक दल हैं जो जिंदा रह सके। इनके टिकाऊ होने के सामान्य कारण हैं। केवल दादाभाई नौरोज़ी, फ़ीरोज़ शाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले से महात्मा गांधी तक और जवाहर लाल नेहरू से सरदार पटेल, मौलाना आजाद से इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिंहराव, सोनिया-मनमोहन-राहुल युग के नेताओं की नेतृत्व शैली का मामला नहीं है बल्कि बदलाव के साथ निरंतरता की ललक ही इसका जीवनमंत्र है। 

दूसरे शब्दों में, समय के साथ आगे जाने की दक्षता ने कांग्रेस को जीवित रखा। अब यह खुद के पुनराविष्कार की प्रवृत्ति खत्म हो गई है। खासतौर से 2014 व 2019 की करारी पराजय के बाद। इस पुरानी पार्टी के लिए सबसे निराशाजनक यह है कि उसने अपनी विचारधारा को तराशने, नैतिक साहस, भीतरी मतभेदों को सुलझाने, नेतृत्व प्रदान करने व दिशा बोध की क्षमता को खो दिया।

कांग्रेस की वैचारिक स्पष्टता का ताकत भी लगभग लुप्त हो चुकी है। आर्थिक उदारीकरण के बाद के दौर में लोकतांत्रिक समाजवाद के नाम पर केवल मुँह चलाया गया। सोनिया-राहुल युग में पार्टी की समाजार्थिक सोच ‘सब चलता है’ तक सिमट गई। 

राहुल मोर्चे पर प्रेरणा या नेतृत्व देने में विफल रहे हैं। मई 2019 में उनके इस्तीफ़े से न पार्टी को कुछ हासिल हुआ और न अपने मक़सद की दिशा में कुछ पा सके। कांग्रेस निराशाजनक तौर पर नेहरू-गांधी परिवार पर निर्भर हो गई और यह परिवार कांग्रेस पर। प्रियंका को राहुल की जगह लाने में विलंब टूटन को टाल सकता है लेकिन सब बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे जैसा रवैया अपना रहे हैं।

कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की वापसी से भाजपा को पछाड़ने में मदद नहीं मिल सकती। बस,यदि गांधी परिवार अपने को सच्चा लोकतंत्रवादी दिखा सकता है। यह तो तय है कि राहुल को गुलाम नबी आजाद, मनीष तिवारी, शशि थरूर या कपिल सिब्बल जैसों से कोई ख़तरा नहीं है। समूह- 23 के ये असंतुष्ट नेता यदि किसी के पद और हैसियत को प्रभावित कर सकते हैं तो ले केसी वेणुगोपाल, रणदीप सुरजेवाला अथवा राजीव सातव हो सकते हैं। लिहाजा, इस स्तर के नेताओं की स्पर्धा में उलझना राहुल का अनाड़ीपन ही होगा। गांधी परिवार केवल कुछ त्याग करते हुए झंझटों को समाप्त कर सकता है। राष्ट्रवादी कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्र समिति, वायएसआर कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस को बुलाना इस दिशा में पहला और आगे का क़दम हो सकता है। 

कई तरह से, कांग्रेस को अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी से सीखना चाहिए। भाजपा की विचारधारा दक्षिण-मध्य केन्द्रित है और इसके पूर्व अवतार-भारतीय जनसंघ, हिंदू महासभा अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ही लें तो वे बहुसंख्यक मुद्दों पर केन्द्रित रहे हैं जैसे गोवध, काश्मीर का मिलाप, राम मंदिर या मोटे तौर पर भारत में हिंदू की सांस्कृतिक पहचान। उनके सामने कई बाधाएँ भी रहीं। 9151 के आम चुनाव से लेकर 1969 तक देश में कोई मान्यता प्राप्त विपक्ष या विपक्ष का नेता नहीं था।लेकिन उसे असल प्रतिदान 1996 में तब मिलना शुरू हुआ जब केन्द्र में अटल बिहारी सरकार ने शपथ ली।

एक अनुमान के अनुसार संघ परिवार के पास 137 अनुषांगिक संगठन हैं जो समाजार्थिक व वीर सावरकर, गुरु गोलवलकर व पं. दीनदयाल उपाध्याय से लेकर वर्तमान संचालक मोहन भागवत तक परोक्ष रूप से काम करते हैं। सोनिया-राहुल को यह मंथन करना चाहिए कि कांग्रेस के पास कितनी संस्थाएँ हैं?  कैडर की गुणवत्ता व समर्पण की तो बात ही मत करिए। कांग्रेस ने अपनी कमी को भरने के लिए यह जाने बग़ैर उदारवादियों व वामपंथियों पर भरोसा किया कि वाम-उदार की चर्चा बिल्कुल अलग है। कांग्रेस व्यक्तित्व की महत्ता की अनदेखी कर रही है। हाल में दस जनपथ पर सोनिया व समूह-23 के बीच बैठक में राहुल ने कहा कि व्यक्तित्व महत्वपूर्ण नहीं है। यह उन्होंने नेतृत्व के मुद्दे पर कहा। 

जवाहर लाल नेहरू का पड़नाती इस मामले में पूरी तरह गलत था। उन्हें याद रखना चाहिए कि 1951 के आम चुनाव में कांग्रेस का नारा था-नेहरू को वोट देने का मतलब कांग्रेस को वोट देना है। इंदिरा गांधी, वर्तमान में नरेंद्र मोदी की तरह, अपने पूरे कार्यकाल में एक बड़े वर्ग द्वारा पसंद या नापसंद की जाती रहीं। हाल में, केरल व हैदराबाद के नगर निकाय चुनाव में भी व्यक्तित्व को सामने रखा गया। 

शोध व फीडबैक जरूरी है। कई लोग 2014 व आगे की जीत को मोदी-शाह से जोड़ते हैं। इसमें विवाद नहीं लेकिन गहराई से जाँचने पर कई नौकरशाहों और अफ़सरों की भी शाह-मोदी की बड़ी छवि गढ़ने में अहम भूमिका नजर आती है। पर्दे के पीछे के ये लोग अनचीन्हे नायक होते हैं। कांग्रेस के पास पचास सालों तक राज्यकर्मी के बावजूद सेवानिवृत्त राजनयिकों, ख़ुफ़िया अधिकारियों , सेनाधिकारियों आदि की सेवाएँ लेने की कोई व्यवस्था नहीं है। ये लोग उन खादीधारियों की अपेक्षा काफी अनुभव, संपर्क व जनता की नब्ज़ की जानकारी रखते हैं। कुल मिलाकर, कांग्रेस समाज में अपनी जड़ें खो चुकी है। भाजपा विभिन्न धार्मिक समूहों और संप्रदायों के साथ सभा-सम्मेलनों में अपना संजाल बुन चुकी है। उसके प्रति सहानुभूति रखने वाले हर जगह मिल जाते हैं। सोश्यल मीडिया में उसकी तगड़ी मशीनरी काम करती है। लाखों लोगों से संवाद करती है। कांग्रेस की कुछ साख है लेकिन पंचायत से लेकर संसद तक विचारों को प्रभावित करने वालों की एकदम कमी है। 

(लेखक दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं। दस जनपथ पर क़रीबी नजर रखते हैं। यह लेख साभार )

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