भोपाल। राज्य सूचना आयुक्त विजय मनोहर तिवारी ने एक फैसले में कहा है कि सूचना का अधिकार कानून आने के पहले भी घोटाले उजागर होते रहे हैं। खोजी पत्रकार हमेशा ही अपने भरोसेमंद सूत्रों की ताकत और अपनी पत्रकारीय निष्ठा से ऐसे गोपनीय दस्तावेज हासिल करने में कामयाब रहे, जिनसे गड़बड़ियां उजागर हुईं और दोषियों को सजाएं मिलीं। इसलिए यह दलील स्वीकार करने योग्य नहीं है कि भ्रष्टाचार के खुलासे के लिए सूचना के अधिकार का सहारा ही एकमात्र रास्ता है।

शहडोल के आवेदक वरुण कुमार ने महिला बाल विकास विभाग में एक आवेदन लगाया था, जिसमें उन्होंने कुछ सालों के दौरान “सभी मदों’ में प्राप्त बजट और इस बजट के आय-व्यय से संबंधित “समस्त बिल-बाऊचर’ के दस्तावेज मांगे थे। विभाग से जब यह जानकार नहीं मिली तो उन्होंने आयोग में अपील पेश की। सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि विभाग में बड़े पैमाने पर आर्थिक अनियमितताएं हैं। कभी भी विभाग से कोई जानकारी नहीं दी जाती। वे एक पत्रकार हैं और भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए उन्हें ये जानकारियां चाहिए। सूचना आयुक्त तिवारी ने उनकी इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि सूचना का अधिकार कानून तो 15 साल पहले 2005 में आया है। जब यह अधिकार नहीं था तब भी देश के सम्मानित खोजी पत्रकारों ने बड़े-बड़े घोटाले उजागर किए, जिनसे व्यवस्था में जरूरी सुधार हुए और दोषियों को जेल जाते हुए भी देश ने देखा। ऐसी खोजी पत्रकारिता सूचना के अधिकार जैसे रेडीमेड गलियारे की मोहताज कभी नहीं रही। लेकिन सामाजिक सरोकारों के प्रति निष्ठावान पत्रकारों ने अपने विश्वसनीय सूत्रों के सहारे सरकारी फाइलों तक पहुंचने में सफल हुए और सच सामने लेकर आए। अब सूचना के अधिकार में यह देखा जा रहा है कि भ्रष्टाचार के नाम पर बेहिसाब जानकारियों के दर्जनों एक जैसे आवेदन सरकारी कार्यालयों में देना किसी व्यापक लोकहित को सिद्ध नहीं करता। एक आवेदन में किसी विभाग की समस्त प्रकार के बजट और समस्त प्रकार के खर्चों का हिसाब मांगना सूचना के अधिकार का विवेकपूर्ण उपयोग नहीं है।

अपने आदेश में सूचना आयुक्त ने दिल्ली के पत्रकार श्यामलाल यादव का उल्लेख किया है, जिन्होंने आरटीआई का रचनात्मक इस्तेमाल करके व्यवस्था की खामियों को उजागर किया और इस कानून के धैर्यपूर्ण उपयोग के अपने अनुभवों को किताब की शक्ल में लेकर आए। आरटीआई से पत्रकारिता नाम की उनकी किताब हिंदी के अलावा अंग्रेजी और मराठी में भी छपकर आई। सूचना के अधिकार के तहत सरकारी दफ्तरों में आवेदन लगाने वाले पत्रकारों को यह एक गौरतलब दस्तावेज है। आयोग ने अपीलार्थी के तर्कों को अस्वीकार कर दिया अौर आदेश दिया कि चाही गई एकमुश्त जानकारी देने योग्य नहीं है। आयोग ने हाल ही में एक ही आवेदन में अनेक विषयों की बेहिसाब जानकारियों को सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 की धारा 6 (1) के तहत दिलाने से इंकार किया है। हाल ही में आयोग ने ऐसी कई अपीलें रद्द की हैं।


-“सूचना का अधिकार कानून 15 साल पुराना हो चुका है। ऐसे आवेदन बचकाने हैं, जिनमें आवेदक को किसी विभाग की हर ईंट और रेत के हर कण का हिसाब जैसी असीमित जानकारियां एकमुश्त चाहिए। इनमें कोई लोकहित नहीं है। इस कानून की गरिमा उसके विवेकपूर्ण इस्तेमाल पर टिकी है।’

विजय मनोहर तिवारी, राज्य सूचना आयुक्त, मध्यप्रदेश

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