रवीन्द्र शुक्ला

मध्यप्रदेश के  इतिहासविद और शिक्षाविद  प्रोफेसर डॉ बैजनाथ शर्मा को भोपाल, खासतौर पर बरकतउल्ला विवि का इतिहास याद करेगा

जब वे राजधानी भोपाल स्थित इस विवि के कुलपति बने, तब विवि की जमीन का बड़ा हिस्सा अतिक्रमणकारियों के कब्ज़े में था। वह जमीन विवि के खेल मैदानों के लिए थी। वे लोग बाहुबली और रसूखदार थे और उन्होंने उस बड़ी जगह को अपनी भैंसें चराने के लिए चरागाह बना रखा था। उन लोगों से अतिक्रमण-मुक्त कराना अत्यन्त कठिन था। किंतु शर्माजी भी महाबली थे। उन्होंने पूरी दबंगता के साथ उन लोगों से सीधे-सीधे  टकराव मोल लिया और ललकारते हुए खदेड़ दिया। तब भोपाल विवि के प्रोफेसरों के बीच राजनीति और गुटबाजी भी चरम पर थी। अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ शर्माजी का साथ किसी ने नहीं दिया। वे अकेले गुंडा तत्वों से लड़े और कुछ ही महीनों मे विवि की शिक्षण व्यवस्था में सुकून देनेवाला बदलाव लाने में कामयाब हुए। कम लोग ही जानते हैं कि भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के विशाल और सुंदर कैंपस के निर्माण का श्रेय डॉ. शर्मा को ही जाता है। 90 वर्ष की आयु में रविवार 10 जनवरी  को जबलपुर में  निधन हो गया।

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ग्वारीघाट शांति धाम पर हुई श्रद्धांजलि सभा में भाव विह्वल वक्ताओं ने उनकी अनुशासन प्रियता, सिद्धांत प्रियता, उच्च नैतिक मानदंडों  तथा छात्र हित के मुद्दों पर दृढ़ रहने के गुणों का जिक्र किया तथा कहा कि वह एक श्रेष्ठ शिक्षक और प्रशासक तो थे ही, सरल, सहज, सहृदय, मिलनसार इंसान थे। समाज के सभी तबकों में उन्हें चाहने वालों की संख्या काफी बड़ी है।

डॉ. बैजनाथ शर्मा ने जबलपुर और सागर विश्वविद्यालयों के इतिहास विभाग में अपनी दीर्घकालीन सेवाओं के दौरान विभागाध्यक्ष और डीन के पदों पर काम किया। वर्ष 1980 में भोपाल विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए उन्होंने इस विश्व विद्यालय के सुचारु संचालन की नींव रखी। उनका जन्म 18 अगस्त 1930 को होशंगाबाद जिले की बनखेड़ी तहसील के ग्राम मछेरा में किसान परिवार में हुआ था। स्कूली शिक्षा पिपरिया में हुई । उन्होंने जबलपुर और बनारस से स्नातक एवं स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्राप्त की। उन्होंने प्रसिद्ध इतिहासविद डॉ. राजबली पांडे के मार्ग दर्शन में ” हर्ष एवं उसका समय-काल” विषय पर शोध अध्ययन किया और पीएच डी प्राप्त की।  उनका यह शोध प्रबंध इतिहास शोध अध्ययन में एक विशिष्ट स्थान रखता है। वह जहां अपने छात्र जीवन में देश के अनेक स्वतंत्रता सेनानियों,  धुरंधर नेताओं और अकादमिक हस्तियों  जैसे डॉ. राममनोहर लोहिया, डॉ. ईश्वरी प्रसाद आदि के  निकट संपर्क में रहे, वहीं अपने प्राध्यापकीय सेवाकाल में उन्होंने कुंजीलाल दुबे और डॉ. शंकर दयाल शर्मा जैसी हस्तियों का विश्वास प्राप्त हुआ। आचार्य रजनीश(ओशो) तो उनके सहपाठी मित्र ही थे।

डॉ. शर्मा ने योरोप के कई देशों की शैक्षणिक यात्राएं की थीं। उन्हे कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया था। स्वभाव से धरती- पुत्रवत्, सहज, शालीन, मैत्री संबंध सदा निभानेवाले डॉ. शर्मा महाकौशल क्षेत्र  की अनेक शैक्षणिक, सामाजिक संस्थाओं के प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक रहे।

डॉ. बैजनाथ शर्मा अपने पीछे पत्नी श्रीमती शांति देवी शर्मा ( सेवानिवृत्त प्राचार्या), तीन पुत्र प्रोफेसर डॉ. सुभाष शर्मा (रानी दुर्गावती वि वि जबलपुर), जस्टिस सतीश शर्मा ( उच्च न्यायालय, बैंगलूरु), कमांडर शरद शर्मा एवं दो पुत्रियों सहित भरा पूरा परिवार और अनेकानेक सुहॄद शिष्य व स्नेहीजन छोड़ गए हैं।

(शुक्ला नईदुनिया इंदौर में वरिष्ठ सह संपादक रहे हैं।)

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