#विजय मनोहर तिवारी
आमतौर पर मैं किसी व्यक्ति विशेष के बारे में टिप्पणी करता नहीं हूं। केवल विषयों पर बात करता हूं। लेकिन आज एक शख्स के बारे में दो बातें करना चाहता हूं। यह पोस्ट गोविंद सक्सेना के बारे में है। गोविंद एक आम इंसान हैं। न आईएएस हैं, न आईपीएस। वे विधायक या सांसद भी नहीं हैं, मंत्री होना तो दूर। न क्रिकेटर हैं, न सिनेमा के स्टार। वे तो किसी राजधानी में रहते भी नहीं हैं। फिर वो कौन हैं और क्यों मेरा ध्यान उन पर गया है? आइए उनके बारे में जानते हैं।

गाेविंद सक्सेना वनस्पति शास्त्र में एमएससी हैं और कॉलेज के प्रतिभाशाली विद्यार्थी रहे हैं। लेकिन यह आज की बात नहीं है। वे 27 साल पहले कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं। वे विदिशा में रहते हैं, जिन्होंने प्राणिविज्ञान को प्रणाम करके पत्रकारिता में कदम रखे। छोटे शहर में काम करने वाले पत्रकारों की मुश्किलें कम नहीं होतीं। वे कितना भी बड़ा कमाल दिखा दें, उनका सब कुछ उसी जिले में छपने वाले चार पन्नों तक सीमित रहता है। यदाकदा ही उनका लिखा हुआ कभी फ्रंट पेज पर बाकी शहरों में पढ़ा जाता हो। जो राजधानी में है, वह खलीफा है। सिविल लाइंस या मलाबार हिल्स या शिवाजी नगर या चार इमली के सरकारी ड्राइंग रूम में। बैठे-ठाले बगदाद का खलीफा।

गोविंद सक्सेना की उम्र 50 पार है और जो अखबार मालिक संपादक बनाने के पहले सामने की कुर्सी पर बैठे पत्रकार से उसकी उम्र पूछते हैं वे यह पोस्ट ध्यान से पढ़ लें। उम्र पूछते हुए वे एक ऐसे घटिया खरीददार की तरह नजर आते हैं जैसे कोई मवेशी खरीदने वाला कुशल कारोबारी मवेशी के दांत टटोलता है। वे सोचते हैं कि अगर उम्र 30-35 है तो बंदा काम का है। कुछ निचोड़ने लायक उसमें बचा हुआ है। जोश से काम करेगा। पैकेज-प्रमोशन की उम्मीद में दिन-रात खटेगा। लगा रहेगा। अगर पचास का है तो चुक गया है। अब कुछ नया करने लायक जोश इसमें बचा नहीं है। विदिशा में पत्रिका अखबार के संवाददाता गोविंद सक्सेना ने ऐसे अखबार मालिकों को अपने काम से करारा जवाब दिया है और उनके इसी जवाब की वजह से मैं यह लिख रहा हूं।

यह शख्स चौकन्ना है। मुद्दों को पकड़ने का हुनर इसमें है। ग्राउंड पर जाकर कड़ी मेहनत का माद्दा इसके पास है। जोश, जुनून और जज्बे के जुमले आए जहां से भी हों, हैं इसके पास। राजधानियों में अपने लाभ-शुभ की घात में बैठे बड़े-बड़े संपादक और ब्यूरो चीफ खुद देख लें। इस समय देश की एक बड़ी खबर सिर्फ गोविंद सक्सेना के पास है। ग्राउंड और लाइव रिपोर्ट। किसी मंत्री या अफसर की दी हुई नहीं, जो जस की तस चला दी जाए। उसकी नजर में एक पुराना राजमहल आया है, जिस पर किसी के कब्जे को ग्राउंड पर जाकर देखने की चुनौती है। यूपी में योगी आदित्यनाथ मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद के गैरकानूनी कब्जों पर प्रहार कर रहे हैं, यह सबको पता है। लेकिन मध्यप्रदेश में यह सिर्फ गोविंद सक्सेना की नजर में है कि एक महल पर किसके सदियों पुराने पुराने कब्जे गैर कानूनी हैं?

मामला शुरू से सुनिए। एक फेसबुक पोस्ट को यह संवाददाता विदिशा की अपनी रोजमर्रा की दौड़धूप में इसलिए गौर से पढ़ लेता है क्योंकि यह उसके अपने जिले का मामला है। मामला यह है कि एक दिन देश के मशहूर इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र उदयपुर नाम के एक उदास कस्बे में जा पहुंचते हैं। वे हेरिटेज वॉक पर निकले हैं और देखते हैं कि परमार राजाओं के समय के एक प्राचीन राजमहल पर निजी संपत्ति का साइन बोर्ड चमक रहा है। यह जानकारी चंद तस्वीरों के साथ फेसबुक पेज पर नुमाया होती है। दर्जनों संपादक हैं। सैकड़ों संवाददाता हैं। अखबारों में हैं। टीवी हैं और इनके बीच डिजिटल मीडिया के खोमचे भी खूब सजे हैं। िसर्फ गोविंद सक्सेना हैं, जो सीधे इतिहासकार को आधी रात के वक्त फोन करके माजरा समझते हैं और अगली सुबह ही अपनी बाइक से उदयपुर निकल जाते हैं।

वे उस राजमहल के खंडहरों पर दिन भर भटकते हैं। मलबे में दबे गलियारों पर जाते हैं। धूल-धूसरित कमरों में दाखिल होेते हैं। सुरंगों में झांकते हैं। जर्जर छतों पर जा चढ़ते हैं। टूटी सीढ़ियों को लांघते हैं। और एक हजार साल पुराना वैभव उनसे बात करने लगता है। वे झाड़ियों मंे खड़े होकर सुनते हुए मंत्रमुग्ध हैं। वे पागलों की तरह तस्वीरें लेते हैं। वीडियो बनाते हैं। कब अंधेरा हो गया पता ही नहीं चला। अभी तो उन्हें आज की कवरेज भोपाल भी भेजनी है। वहीं कहीं कोने से मोबाइल पर लिखने लग जाते हैं। मेल पर फोटो और कॉपी भेजने के बाद ही होश आता है कि सुबह नाश्ते के बाद कुछ खाया भी नहीं है। मैसेज बॉक्स में पत्नी और बच्चों के मैसेज पड़े हुए हैं। उनका संदेश जाता है-‘अब लौट रहा हूं।’

यह एक ऐसे ऐतिहासिक कस्बे की कहानी है, जिसमें एक हजार साल बाद डॉ. सुरेश मिश्र के बाद गोविंद सक्सेना अचानक आ गए हैं। यह परमार राजाओं के महान कृतित्व की कहानी है, जिस पर उदयादित्य नाम के राजा भोज के उत्तराधिकारी ने चार चांद लगा दिए थे। लेकिन झंडे पर चांद और तारा जड़कर आए कुछ हत्यारे जाहिलों ने किसी ने सदी में यहां आतंक फैला दिया था। वह यहां के मंदिर की हर मूर्ति की गवाही है। फिर कब्जों और लूटमार की दास्तान है। महाराज उदयादित्य का राजमहल भी आने वाली सदियों में लुटेरों के हवाले हो गया। काजी-वाजी के नाम से कुछ नई पहचानें उजागर हो गईं। उन्हें बादशाह जहांगीर के पीछे कुछ दिखाई नहीं देता। पुरातत्व विभाग का विदिशा का स्थानीय अफसर अहमद अली परमार राजा उदयादित्य के इस शहर में सिर्फ मुगलों को देखता है। उसकी नजर मुगलों के पीछे नहीं देखती, जब ये शहर बसाया गया, मंदिर और महल बनाए गए।

गोविंद सक्सेना की नजर परमारों तक भेदती है और एक अलग ही सच को उजागर करती है। वह महल की छत पर खड़ा उदयपुर के अतीत से रूबरू है। वह इन खंडहरों से सूरज को डूबते हुए देख रहा है। सदियां बीत गई हैं। जर्जर किलों, ढहती दीवारों, मलबा होते गलियारों, टूटते महलों अौर खंडित मंदिरांे की आवाजें उसके कानों में गूंज रही हैं। आज वह अतीत को सुन रहा है। विदिशा में वर्तमान को तो वह राेज ही सुनता था। कलेक्टोरेट में, एसपी ऑफिस में, पार्टियों के कार्यालय में, अनाज मंडी में। अतीत की यह अावाज सुनने वाला विदिशा का वह अकेला काबिल बेटा है।

 

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