नई दिल्ली.इंडिया डेटलाइन.  गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में किसान आंदोलन के अराजक होने पर आज के समाचार पत्रों ने गहरी प्रसन्नता व्यक्त की है। हिंदी से लेकर सभी अंग्रेजी अखबारों ने इसे लोकतंत्र पर दाग बताया। समाचारों और संपादकीय टिप्पणियों में उन्होंने लिखा है कि यह किसान आंदोलन उसके नेताओं की विफलता है। उनके उकसावे में कुछ लोगों ने लोकतांत्रिक परंपराओं की धज्जियां उड़ाईं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने तो इसे अमेरिका के कैपिटोल हिल की तरह का मामला निरूपित किया।

नवभारत टाइम्स ‘जो हुआ..उसे रोका जा सकता था’ शीर्षक समाचार में बताता है कि उसके रिपोर्ट राजेश पोद्दार ने रात नौ बजे रिपोर्ट किया था कि किसान मजदूर संगठन के लोग संयुक्त मोर्चा की रजमामंदी से अलग जा रहे हैं। यानी जिन नेताओं से सरकार की बात हो रही थी, उनसे हालात नहीं सँभल रहे थे। अगर कुछ लोग उनकी बात नहीं मान रहे थे तो उन्हें इनको रोकने के लिए पुलिस की मदद लेनी चाहिए थी। नभाटा संपादकीय में लिखता है कि ‘किसान आंदोलन ने जो रूप दिखाया, किसी भी सभ्य व लोकतांत्रिक समाज में भयानक व शर्मनाक कहा जाएगा। किसान नेतृत्व पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। कथित किसान नेताओं की भूमिका किसी का मोहरा बन जाने से ज्यादा नहीं है। अब तो सरकार से यह भी नहीं कहा जा सकता कि किसान आंदोलन के नेताओं से बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर कोई सम्मानजनक हल निकाला जाए। बातचीत होगी भी तो किससे, जब यह साफ़ हो गया है कि इन नेताओं की बातचीत को कोई सुनने वाला नहीं होगा।

हिंदुस्तान में शशि शेखर पूछते हैं कि जो ध्वज दंड पर चढ़ा, वह नौजवान कौन था, किसान? उस वक्त वे किसान नेता कहाँ मुँह छिपाए बैठे थे जो कल तक पत्रकारों के सामने शेखी बघार रहे थे कि छब्बीस जनवरी को हम शांतिपूर्वक मनाएँगे। उत्साह से मदमाते हुए उन्होंने यह तक घोषणा कर दी थी कि वह बजट वाले दिन संसद कूच करेंगे। क्या अब उनमें आज शर्म बची है?

हिंदुस्तान अपने अग्रलेख में लिखता है -उन किसान नेताओं को घेरे में लेना चाहिए जिन्होंने खुद किसान नेताओं की जुबान का मख़ौल उड़ाया है। अब प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि सरकार आगे की बातची किससे करे। किसान नेताओं की विश्वसनीयता व प्रासंगिकता पर सवाल खड़े हो गए हैं। अब सरकार की तुलना में पुलिस को ज्यादा तैयारी से रहना होगा। क्योंकि ऐसा ही विश्वास भंग आंदोलन के साथ भी हो सकता है।

यह गणतंत्र दिवस हमें सबक दे गया है कि एक ज़िम्मेदार नागरिक समाज व व्यवस्था के रूप में हमारा विकास शेष है।

टाइम्स ऑफ इंडिया लिखता है -किसान संगठनों ने पुलिस की सारी शर्तों का उल्लंघन किया। किसान व पुलिस के बीच सैतीस शर्तों का समझौता हुआ था। टाइम्स की एक रिपोर्ट कहती है कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी आशंका थी कि यदि किसानों की रैली को अनुमति दी गई तो हिंसा हो सकती है। न्यायालय में सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने जब किसान संगठनों की तरफ से यह दलील दी थी कि वे शांति के लिए किए गए समझौते को पालन करेंगे तब मुख्य न्यायाधीश एसए बोवड़े ने यह आशंका जाहिर की थी।

टाइम्स ने इसे अमेरिका के कैपीटोल की तर्ज़ पर भारतीय कैपीटोल निरूपित करते हुए संपादकीय में लिखा कि किसान नेताओं ने जनता की सहानुभूति खो दी। लालक़िले पर भारतीय ध्वज का अपमान किसान नेताओं के पिछले दिनों अपनाए गए रवैये व उकसाने का परिणाम था। गणतंत्र दिवस पर सुरक्षा इंतज़ामों में  लोचे की भी जाँच होनी चाहिए।

हिंदुस्तान टाइम्स ने लिखा कि हम लगातार किसान संगठनों के अतिवादी रवैये से चेता रहे थे। वे सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों के मुक़ाबले झुकने को बिल्कुल तैयार नहीं थे। लोकतंत्र द्वारा दिए अधिकारों का उपयोग कर अपनी मर्यादाओं में प्रदर्शन कर विरोध जताने की बजाय उन्होंने हर लोकतांत्रिक मूल्य व्यवहार का उड़ाया। इसमें सड़कों पर प्रदर्शन के बारे में भी हमें सबक दिया है।  अब किसानों के आंदोलन ने वैधता खो दी है।

जनसत्ता की संपादकीय कहती है कि किसान आंदोलन की काफी बदनामी हुई है। उन सिद्धांतों पर सवाल खड़े हुए हैं जिन्हें लेकर यह आंदोलन चल रहा था। किसान नेता अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

साइंस के 5 पन्नों के व्यापक कवरेज में बताया गया है कि चालीस बसों को तोड़ा गया। इनमें पैंतीस दिल्ली ट्रांसपोर्ट की थीं। ट्रैक्टर को बैरीकेड्स तोड़ने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया।

अखबार बताया है कि कौन है दीप सिद्धू?

लाल क़िले पर चढ़ने वाले युवाओं का नेतृत्व पंजाबी अभिनेता दीप सिद्धू कर रहा था। उसके लड़कों ने लाल क़िले के ध्वज दंड से तिरंगा उतारकर फेंका और निशान साहिब व अपनी किसान यूनियन का झंडा फहराया। वह 2018 में पंजाबी फिल्म ‘ज़ोरा दास नंबरिया’ से चर्चा में आया।  वह अपने बयानों में आतंकवाद के लिए मारे गए जरनैल सिंह भिंडरावाले को उद्धृत करता रहा है। इसके लिए उसे व उसके भाई मनदीप सिंह को पिछले महीने ही राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने नोटिस जारी किया था। संयुक्त किसान मोर्चा की एक दिन पहली हुई सभा में गैंगस्टर से नेता बने  लाखा सिढाना ने हंगामा कर घोषणा कर दी थी कि वह लाल क़िले जाएगा। इसकी संयुक्त मोर्चा ने अनदेखी की।

 

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