विजय मनोहर तिवारी 
सिनेमा, क्रिकेट और सियासत की सेलिब्रिटियों के कर्कश शोर में समाज की सुपात्र विभूतियाें पर हमारा ध्यान तब तक नहीं जाता जब तक कि देर-अबेर पद्मश्री का सरकारी प्रकाश उन तक न चला जाए। भोपाल में डॉ. कपिल तिवारी एक ऐसी ही हस्ती हैं। एकांत प्रिय कपिलजी मोबाइल फोन नहीं रखते। सोशल मीडिया की सब तरह की चमक से दूर उनकी अपनी दुनिया है, जहां उनके चाहने वाले अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए सुबह-शाम आते-जाते मिलेंगे। कल रात से ही उनके घर में भारी चहल-पहल है। घर गुलदस्तों से भर गया है। मीडिया की टीमें इंटरव्यू के लिए लगातार आ रही हैं। ज्यादातर लोग पहली बार पता पूछते हुए नजर आए। और वही एक सवाल-‘कैसा लग रहा है?’

मैं कपिलजी को हमारे समय के उन गिने-चुने महापुरुषों में शामिल करूंगा, जिन्होंने भारत को शुद्ध भारतीय दृष्टि से देखा और दिखाया है। मध्यप्रदेश की आदिवासी लोककला अकादमी में अपने चार दशक के अनुभव में जैसे वे भारत के लोक में ही उतर गए। अपने बायोडाटा को वजनदार बनाने के लिए वह पन्ने काले करने वाला ऐसा अकादमिक कार्य नहीं था, जिसने व्यर्थ दस्तावेजों के जखीरे लगा दिए हों। गहरे अर्थों में उनकी इस साधना ने यह बताया कि भारत की जीवन धारा का स्त्रोत क्या और कहां है? वे उस अनजाने लोक तक हमें ले जाते हैं, जहां भारत की मूल आत्मा आज भी सुरक्षित है और वहां कुछ ऐसा है, जिसे नष्ट किया ही नहीं जा सकता। उन्हें सुनना सनातन संस्कृति के झरने में शाही स्नान करने जैसा है और वह पोथियों से उपजा ज्ञान नहीं है।

उनका काम किसी भी साहित्यकार, विद्वान, अभिनेता, गायक या चित्रकार की तरह का नहीं है, जिनकी सामाजिक शान में पद्म अलंकरण चार चांद लगाने के लिए होते हैं। बहुत देर से प्राप्त पद्मश्री ने यह मौका दिया है कि हम उनके बारे में यह जान लें कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा की एक देहधारी गंगोत्री हैं। वे 69 साल के हैं और हम सबके सौभाग्य से चैतन्य हैं। उनके जीवन के हर सेकंड से हम सदियों का बहुत कुछ पा सकते हैं, जो हमारे अनुभव से लुप्त है। हमारी सभ्यता और संस्कृति का बहुत कुछ ऐसा जो हमारे जीवन का हिस्सा होने के बावजूद हमारे संज्ञान से परे है। हम 75 साल से अंधेरी आजादी में हैं।

मैं साहित्य-संस्कृति की विधा से नहीं हूं। लोक कलाओं से दूर-दूर का लेना-देना नहीं था। मैं रोजमर्रा की मीडिया की रिपोर्टिंग में रहा हूं, जहां जमाने भर के घटिया लोगों और दोयम दरजे के विषयों को किसी बदकिस्मती की तरह ढोया। किसी संयोग से ही वर्षों पहले कपिलजी से पहली मुलाकात अकादमी के उनके दफ्तर में हुई थी। तब मेरा एकमात्र उपन्यास ‘एक साध्वी की सत्ता कथा’ छपकर आया था और मीडिया की चाकरी के अलावा मैं भारत में इस्लाम के फैलाव की पड़ताल में लगा था।

इस्लाम के आक्रमणों से आहत भारत के हजार-बारह सौ साल के इतिहास की कंदराओं में भटककर मैं हमेशा दुखी मन से कपिलजी के किनारे जा बैठता। वे चुपचाप एक सिगरेट सुलगाकर गहरा कश लगाते। मेरी तरफ ध्यान से देखते जैसे एक अनुभव संपन्न डॉक्टर परेशानहाल मरीज को घूरता है। उनके चेहरे से साफ झलकता कि वे बीमारी को लेकर बिल्कुल बेफिक्र हैं। हर बार उनके पास बैठना भारत की शिराओं में बह रहे उस अंडरकरेंट को छूने जैसा अनुभव था, जो धरती की सतह पर मचे रहे तमाम हत्याकांडों, लूटमार और तोड़फोड़ के सदियों लंबे अंधड़ों से बिल्कुल ही अछूता प्रवाहित था। वे अंधड़ गुजर गए और भारत दुनिया के नक्शे पर अपनी मूल पहचान के साथ बचा रह गया। बेशक एक बड़ी कीमत उसे चुकानी पड़ी, लेकिन वह खत्म नहीं हुआ। कपिलजी की दृष्टि भारत की युगों पुरानी यात्रा को समय की सरल रेखा में नहीं देखती। इसलिए वे भारत के संदर्भ में प्राचीन शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे भारत की सभ्यता को सनातन कहते हैं।

अपने आसपास उनका होना हमारा सौभाग्य है और हम हमेशा ही अपने सौभाग्य से चूके हुए लोग हैं। मेरा सुझाव है कि जिन शहराें में ऐसी विभूतियां हैं, जिनके पास जीवन काे जानने की एक समृद्ध दृष्टि है, हमें उनके पास बैठना चाहिए। स्कूल-काॅलेज शैक्षणिक प्रवासों की तरह कभी उनके पास जाएं या उन्हें अपने पास बुलाएं। प्रश्न न भी हों तो चलेगा। बातचीत करें। नई पीढ़ी को उनसे परिचित कराएं। उनके पास ऐसा बहुत कुछ है, जो हमारी स्मृतियों को जगमगा देगा। उन्हें अपनी स्मृतियों में अंकित करें।

1882 में आईसीएस की परीक्षा पास हुए अंग्रेज नौजवानों का बैच इस मायने में खुशनसीब था कि लंदन से भारत रवाना होने के पहले उन्हेंे भारत को समझने का एक सुनहरा मौका मिला। उन्हें मैक्समूलर से रूबरू कराया गया। मैक्समूलर ने उन्हें भारतीय धर्म, साहित्य और संस्कृति पर सात व्याख्यान दिए थे। मैक्समूलर ने अकेले ऋग्वेद पर जीवन के 27 साल दिए थे। भारत की आत्मा तक पहुंचे वे जर्मनी में पैदा हुए अनोखे भारतीय थे। उनके व्याख्यान भारत को भारत की दृष्टि से देखने की सामर्थ्य देते हैं। आप सोचिए तब यह काम कौन कर रहा था? और हम जो, स्वतंत्र भारत में पैदा हुए हैं, अपने देश को कितना जानते हैं और कितना जानने की जिज्ञासा हमारे भीतर है? कपिलजी की साधना के बारे में कितनों को पता है?

हमारे शिक्षा संस्थानों में किसे फिक्र है कि डिग्रियां टांगने के पहले हमारे युवा ऐसी दृष्टि लेकर निकलें, जो इस अनूठे देश को समझने में मददगार हो? हमारी डिग्रियां दो-दो कौड़ी की नौकरियों का मोहताज बनाकर अंधे भिखारियों की तरह सड़कों पर ठेल रही हैं। सिविल सर्विसेस में चुने जाने वाले और सिर्फ इसी नाते प्रतिभाशाली कहे जाने वाले युवा ऐसे संवेदनहीन रोबोट की तरह सिस्टम में आते हैं, जिन्हें पोजीशन इंजॉय करनी है। वे अब काली चमड़ी के अंग्रेज हैं, जिनका न्यूनतम संपर्क भारत की आत्मा से है। राजनीतिक गलियारों से सत्ता में सेंध लगाने वाले लंपट कितना भारत को जानते हैं और एक शपथ के बाद उस भारत के लिए क्या करते हैं? कभी-कभी लगता है कि धूर्तों की जमातें आजादी के बाद लोकतंत्र के स्तंभों से अमर बेल की तरह लिपट गईं।

मुझे लगता है कि कपिलजी को लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी समेत राज्यों की ऐसी ही अकादमियों में निरंतर सक्रिय किया जाना चाहिए था, जहां वे प्रशासनिक सेवाओं के लिए चयनित भारतीय युवाओं की आंखों से पश्चिम का मोतियाबिंद झाड़ते। उन्हें मेडिकल कॉलेजों में युवाओं की शपथ के पहले कुछ दिन उनके बीच होना चाहिए था और इसी तरह ज्युडिशियल एकेडमी और प्रबंधन संस्थानों में भी ताकि वे पैसा कमाने की मशीनों की तरह निकल रहे नौजवानों की ऊंचे पैकेज की खोपड़ियों में अमृत की कुछ बूंदें उतार देते।

एक ताजे व्याख्यान के अंश

-‘भारत की सांस्कृतिक धारा में केवल पुरुष देव नहीं हैं। मातृशक्ति भी देवरूप में हैं। हाल के एक व्याख्यान में कपिलजी ने सवाल उठाया कि जिन धर्मों में मातृशक्ति की अवधारणा ही नहीं है, वे कैसे हैं और उनके लोग कैसे हैं? दरअसल मातृशक्ति का ऋणी होकर हम अपनी आस्था में प्रवेश करने से दूसरे ही तरह के मनुष्य बनते हैं।’

-‘जिन धर्मों ने अपने तंत्र और व्यवस्थाएं विकसित कीं, उनकी धार्मिकता कम होती गई। पश्चिम की दृष्टि धर्म के संगठन की दृष्टि है। धार्मिकता को उन्होंने कभी अपने अध्ययन का विषय ही नहीं बनाया। भारत के जनजातीय समाज में सब कुछ वाचिक परंपरा मंे रहा। वह शास्त्रों में नहीं आया। वह पीढ़ियों से शुद्ध और सुरक्षित हस्तांतरित हुआ रसपूर्ण ज्ञान है। ज्ञान को आख्यानों में रचकर रस बना दिया। रामायण और महाभारत भी जनजातीय लोक में रस की तरह बहते रहे हैं।’

‘जनजातीय समाज अपने हर कर्म में सच्चा है-कला, साधना, अनुष्ठान, संस्कृति और परंपरा। भगवत्ता जब चेतना में खो जाती है तो भगवान की जरूरत नहीं रह जाती। जनजातीय समाज में प्रकृति ही भगवत्ता में ढली है। उनके मंत्र, पूजा प्रणाली और अनुष्ठान के अध्ययन ही हमें उनके देवलोक में प्रवेश करने की पात्रता देंगे।’

‘जनजातीय समाज ने धर्म के तंत्र और व्यवस्थाएं खड़ी नहीं कीं। वे सच्ची धार्मिकता में सदा ही बने रहे। उनके जीवन में न्यूनतम राज्य की गुंजाइश है। सामुदायिक स्वशासन ही राज्य का काम करता है। भारत का जनजातीय समाज एक तरह की नकद आध्यात्मिकता में रहा, जिसका कोई तंत्र बनाया ही नहीं जा सकता। वे अपने ही रचे हुए अनुशासन में थे और हमने उन्हें पिछड़ा कहा।’

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here