डॉ. महेश परिमल

संगीत जिसकी रग-रग में दौड़ता हो, तबले की थाप जिसकी पहचान हो, क्या वह ऐसा गाना भी रच सकता है, जिसमें तबले की एक थाप भी न हो? जी हां, जिसने भी 1962 में आई फिल्म ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ का गीत “मैं प्यार का राही हूं’ ध्यान से सुना होगा, वह निश्चित रूप से ओ पी के संगीत का कायल हो गया होगा। अब तक कोई गाना ऐसा नहीं बना, जिसमें तबले का प्रयोग नहीं हुआ हो, पर इस गाने में तबले की एक थाप भी नहीं है। गाने में सेक्सोफोन का ही इस्तेमाल अधिक हुआ है। यह ओ पी नैयर के जिद्दीपन के कारण ही हो पाया है।

हुआ यूं कि इस गाने की पूरी तैयारी हो गई थी। रफी साहब और आशा भोसले जी समय पर पहुंच चुके थे। पर तबलची समय पर नहीं आ पाए। शायद वे नैयर साहब के सनकीपन से खफा थे। उन्हें यह घमंड हो गया था कि हमारे बिना नैयर साहब गाना रिकॉर्ड ही नहीं कर पाएंगे। इसलिए वे सभी विलम्ब से पहुंचे। पर नैयर साहब कहां मानने वाले थे। उन्होंने कह दिया कि अब तो यह गाने बिना तबले के ही रिकॉर्ड होगा। हुआ भी वही, गाना रिकॉर्ड हुआ। सभी ने उस गाने की तारीफ की। तब तक किसी ने सोचा भी नहीं था कि बिना तबले की थाप के गाना रिकॉर्ड किया भी जा सकता है। यह नैयर साहब की सनक ही थी, जो इस तरह से हमारे सामने आई।

कोई कितना जिद्दी हो सकता है? आइए, 28 जनवरी को पुण्यतिथि पर संगीतकार ओमकार प्रसाद नैयर के व्यक्तित्व को समझने की एक छोटी-सी कोशिश करें। कहा जाता है कि वे जिद्दी ही नहीं, बल्कि सनकी भी थे। वैसे देखा जाए जो सनकी होता है, उसकी सनक के पीछे न केवल उसकी जिंद बल्कि अपने क्षेत्र की महारत हासिल होती है। सनक और जिद ने हमें कई नायाब चीजें दी हैं। अब संगीत की बात करें, तो ओपी नैयर हमारे सामने एक ऐसे सनकी संगीतकार के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने लता मंगेशकर से कभी कोई गाना नहीं गवाया। पर सबसे अधिक राशि लेने वाले संगीतकार भी बने। यह उनका सनकीपन ही था, जिसके कारण उन्होंने गर्दिश के दिनों में भी लता मंगेशकर पुरस्कार लेने से मध्यप्रदेश सरकार को साफ इंकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने यह स्वीकार किया कि “जब मुझे पैसे की सख्त जरूरत थी, तो मैंने इसके लिए पुरस्कार को ठुकरा दिया।”

ओ पी नैयर का विवाद का रिश्ता हमेशा गहरा ही बना रहा। फिर चाहे वह अपनी साफगोई को लेकर हो, या फिर अपनी जबान को लेकर। मुकेश को उन्होंने कभी श्रेष्ठ गायक नहीं माना। उनके संगीत निर्देशन में मुकेश ने कुल जमा चार गीत ही गाए हैं। उसमें से सबसे अधिक हिट रहा, फिल्म ‘संबंध’ का ‘चल अकेला, चल अकेला’। इस गीत को लिखा है, कवि प्रदीप ने। ओपी कभी भी कवि प्रदीप के सामने नहीं आते थे। उनकी नजर में कवि प्रदीप बहुत ही सीधे-सादे व्यक्ति थे। नैयर साहब अपनी जुबान पर काबू नहीं रख पाते थे। वे इस बात से डरते थे कि कहीं कवि प्रदीप के सामने वे अपशब्द न बोल जाएं। इसलिए उन्होंने प्रदीप जी उनके लिखे गानों को हमेशा डाक से मंगवाया।

लता से गाना न गवाने पर उनका मानना था कि लता जी की आवाज में पाकीज़गी है। मुझे अपने गाने में शोखी की जरूरत है। जो आशा में है। इसलिए मैं आशा जी से अपने गाने गवाता हूं। आशा जी के साथ उनके संबंध पूरे 14 साल तक रहे। उसके बाद जो खराब हुए, तो उनके जीते-जी सुधर ही नहीं पाए। इसी तरह मोहम्मद रफी जी के साथ भी उनका विवाद हुआ। इसके चलते फायदा हुआ, महेंद्र कपूर को। वैसे मुकेश की तरह वे महेंद्र कपूर को भी अच्छा गायक नहीं मानते थे, पर रफी साहब से विवाद के चलते उन्होंने महेंद्र कपूर से कई गीत गवाए, जो हिट रहे। इसी जिद्दीपन के कारण उन्होंने अपना परिवार छोड़ा। पत्नी और बच्चों को छोड़कर वे थाणे में किसी के यहां पेइंग गेस्ट के रूप में रहे। वहीं उनका 2007 में निधन हो गया।

ओपी नैयर शख्सियत की पहचान उनके विद्रोही स्वभाव में मिलती है। कहते हैं कि उनके पिता परम अनुशासित व्यक्ति थे। बचपन में नैयर ने पिता जी से इतनी मार खाई कि विद्रोह तब से ही उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया। ऐसा विद्रोह, ऐसी सख्ती जिसे उनके भीतर बह रहा संगीत का तरल बहाव भी नरम नहीं कर पाया और एक दिन किसी बात का विरोध करते हुए उन्होंने घर ही छोड़ दिया। ये नाराजगी इतनी बढ़ी कि नैयर ने अंतिम इच्छा में कहा कि उनका परिवार उनके अंतिम संस्कार में न आए। उनके निधन के बाद ये इच्छा पूरी भी की गई।

नैयर स्वीकारते हैं कि उन्हें संगीत की तकनीकी जानकारी बहुत कम है। मगर नौशाद, शंकर-जयकिशन और एसडी बर्मन जैसे महारथियों के बीच भी उन्होंने अपनी एक अलग ही पहचान बनाई, यह अद्भुत है। पचास के दशक के दौरान आल इंडिया रेडियो ने इनके संगीत को आधुनिक कहते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया और इनके गाने रेडियो पर काफ़ी लंबे समय तक नहीं बजाए गए। इस बात से उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ, बल्कि वे अपनी धुन बनाते रहे और वे सभी देश में बड़ी हिट रही। उस समय सिर्फ़ रेडियो सिलोन पर ही इनके नए गाने सुने जा सकते थे। बहुत जल्दी ही अँग्रेज़ी अख़बारों में इनकी तारीफ के चर्चे शुरू हो गए और इन्हें संगीत का उस्ताद कहा जाने लगा।

यूं तो उनके कई प्रसंग हैं। जो गाहे-बगाहे हमारे सामने आते रहते हैं। पर ओ पी की बात ही कुछ और है। सबसे महंगे संगीतकार का खिताब जिसके सिर पर हो, वही अपनी जिंदगी का आखिरी वक्त गर्दिश में काट रहा हो। ऐसा कई लोगों के साथ हुआ है। गुरुदत्त की मौत पर गीता दत्त और वहीदा रहमान को खरी-खोटी सुनाने वाले ओ पी नैयर ने जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया। जिससे भी नाता तोड़ा, उसे जोड़ने की कभी कोशिश नहीं की। चाहे वह अपना परिवार हो या कोई गैर। बिरले ही होते हैं, जो इस तरह की जिंदगी को स्वीकारते हैं और जी भी लेते हैं। ओम प्रसाद नैयर को शत-शत नमन…

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