राकेश अचल

देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी विश्व स्तर के नेता हैं लेकिन वे कभी-कभी ऐसी बात कह देते हैं जो उनकी मेधा पर प्रश्नचिन्ह लगा देती है. प्रधानमंत्री जी ने संसद में आन्दोलनजीवी समाज की निंदा कर एक तरह से अपना अज्ञान प्रकट कर दिया है. पता नहीं वे कैसे भूल गए कि प्रश्नाकुलता और आन्दोलनजीविता ही भारतीय समाज की विशेषता रही है .स्वयं प्रधानमंत्री जी एक ख़ास तरह के आंदोलन की उपज हैं .
भारत का इतिहास तो आंदोलनों का ही इतिहास है और प्रधानमंत्री जी की इस टीप से समूचे इतिहास के आंदोलनों की अवमानना हुई है .प्रधानमंत्री जी ने आन्दोलनजीवी समाज पर बिना सोचे-समझे टिप्पणी कर दी है ऐसा नहीं है,वे देश में 74 दिन से चल रहे किसान आंदोलन से आजिज आ चुके हैं. किसानों की इस आन्दोलनजीविता ने सरकार की छवि को देश में ही नहीं बल्कि देश के बाहर की दुनिया में भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है .प्रधानमंत्री जी को आन्दोलनजीविता पर ऊँगली उठाने से पहले अपनी विद्व्त सभा से विमर्श करना चाहिए था .उनके पास इतिहास के मर्मज्ञों की पूरी फ़ौज है जो उन्हें भारत और दुनिया में आन्दोलनजीवी समाज के बारे में ज्ञान दे सकती थी .
भारत सभ्यता,संस्कृति और स्वर्णिम अतीत के बावजूद सैकड़ों वर्षों तक पराधीनता के दंश को भी झेल चुका है. ये भारतीय समाज की आन्दोलनजीविता ही थी जो भारत एक लम्बे आंदोलन के बाद स्वाधीनता का सुख हासिल कर सका.दुर्भाग्य ये है कि प्रधानमंत्री जी जिस समाज से आते हैं उस समाज के कुछ ही लोग इस स्वाधीनता आंदोलन के अंग रहे .बावजूद इसके वे जिस तरह की राजनीति और संस्कारों में पले-बढ़े हैं उसमें भी आंदोलन एक आवश्यक जरूरत रही है.जिसमें राम मंदिर -बाबरी मस्जिद का आंदोलन तो आजाद भारत के इतिहास का एक उल्लेखनीय आंदोलन रहा है .
मोटे तौर पर जान लीजिये कि संगठित सत्ता तंत्र या व्यवस्था द्वारा शोषण और अन्याय किए जाने के बोध से उसके खिलाफ पैदा हुआ संगठित और सुनियोजित अथवा स्वतःस्फूर्त सामूहिक संघर्ष ही आंदोलन है.वैसे हमारे समाज में केवल राजनीतिक आंदोलन ही नहीं हुए हमारे यहां सामजिक कुरीतियों ,धार्मिक जरूरतों,पर्यावरण और अन्य विषयों को लेकर लम्बे और निर्णायक आंदोलन हुए हैं ,ऐसे में एक किसान आंदोलन को निशाना बनाकर समूचे समाज की आन्दोलनजीविता को लांछित करना हास्यास्पद प्रतीत होता है .
आजादी के पहले के आंदोलनों की एक लम्बी फेहरिस्त है .प्रधानमंत्री जी तो स्नातकोत्तर उपाधिधारक हैं हमने तो प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में ही तमाम आंदोलनों के बारे में पढ़ा है ,इसलिए आन्दोलनजीविता पर मै निजी तौर एक अभद्र टिप्पणी मानता हूँ और इसकी निंदा करता हूँ .बीते सात वर्षों में मौजूदा सत्ता को समाज कि प्रशनाकुलता कांटें की तरह चुभती रही है और अब उसे आंदोलन भी चुभने लगे हैं .प्रश्नाकुलता और आंदोलन का विरोध अलोकतांत्रिक और फांसीवादी चिंतन का आभास कराता है .क्या सत्तारूढ़ भाजपा बिना आंदोलनों के लोकसभा में 2 से 302 सीटों पर पहुँच गयी है ?
कितनी हैरानी की बात है कि कल तक जिस समाज में प्रश्नकर्ताओं और आंदलनकारियों का सम्मान किया जाता था आज उन्हें ही देश के सबसे बड़े और सम्मानित मंच पर अपमानित किया जा रहा है .इस देश में हाल के डेढ़ सौ वर्षों में महात्मा गांधी जैसा कोई आंदोलनकारी नहीं हुआ .क्या आंदोलजीविता पर नाक-भौं सिकोड़ना महात्मा गांधी और उन असंख्य अनाम लोगों का अपमान नहीं है जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी कुर्बानियां दी हैं .कुआ स्वामी दयानन्द सरस्वती,राम मोहन राय,और आज के चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा प्रधानमंत्री जी की टिप्पणी से आहत नहीं हुए होंगे ?
दुनिया के हर देश में जो भी तब्दीली आज आप देख रहे हैं उन सबके पीछे वहां के आंदोलन ही हैं.जिस देश के पास आंदोलन का विवेक नहीं है उस समाज और देश की अवनति ही हुई है .आंदोलन एक ऐसा बिना बारूद का अस्त्र है जो गलत को सही करने की ताकत रखता .दुनिया के किसी भी देश का इतिहास उठाकर देख लीजिये,वहां कोई न कोई आंदोलन देश की अस्मिता का प्रतीक बना है .भारत में चल रहा किसान आंदोलन भी एक अनुपम उदाहरण है .
दनिया में एक देश के आंदोलन ने दुसरे देश को प्रभावित किया है .आंदोलन का अर्थ ही जड़ता को मिटाकर समाज को संघर्ष के लिए तैयार करना होता है .दुर्भाग्य से अब सत्ता प्रतिष्ठान को जनता का संघर्ष पसंद नहीं है. सत्ता प्रतिष्ठान चाहता है कि जनता सिर झुककर बंधा मजदूर की तरह सरकारी हुक्म की तामील करती रहे ,लेकिन ये असम्भव है.आजादी के बाद जिस देश में आपातकाल को एक प्रबल जन आंदोलन ने उखाड़ फेंका वो देश किसी भी दम्भी सत्ता प्रतिष्ठान को समय आने पर सबक सीखने में समर्थ है .
एक भारतीय के नाते मुझे गर्व है कि हम आन्दोलनजीवियों के वंशज हैं .हमारे पुरखों में नाथूराम गोडसे नहीं हैं तो नहीं है .लेकिन हम गांधी,भगत सिंह मौलाना आजाद पर तो गर्व कर ही सकते हैं .हमारे किसान भी इन्हीं पूर्वजों के वंशज हैं ,दुर्भाग्य ये है कि अब प्रश्न करना और आंदोलन करना देशद्रोह की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है .मुझे तो आशंका है कि प्रश्नकुलता और आंदोलनों की विरोधी सरकारें आने वाले दिनों में कोई क़ानून बनाकर जनता उसके ये दोनों हथियार छीनने का दुस्साहस न कर बैठें .महात्मा गाँधी ने आंदोलन शब्द को ही नए सिरे से परिभाषित किया .आज हम उन्हीं के बताये रास्ते पर चल रहे हैं ,लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान के लिए हर आंदोलन आँख की किरकिरी बन चुका है .
आज दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो किसी न किसी आंदोलन का सामना कर रहा हो .चीन में अमेरिका में ,रूस में फिलस्तीन में अपने अपने तरीके के आंदोलन चल रहे हैं .जहाँ अन्याय के खिलाफ समाज आंदोलित नहीं होता उसे प्रताड़नाएं सहना ही पड़तीं हैं. दुनिया की कोई भी सत्ता किसी भी आंदोलन को सहन नहीं करती लेकिन उसकी अनदेखी करने का साहस भी किसी सत्ता प्रतिष्ठान के पास नहीं है .आंदोलन कुचले जा सकते हैं,कुचले जाते हैं लेकिन उन्हें समूल नष्ट नहीं किया जा सकता .वे अनुकूलता मिलते ही फिर पल्ल्वित-पुष्पित हो जाते हैं .
भारत में उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक आन्दोलनजीविता पर किये गए तंज की निंदा हुई है .प्रधानमंत्री जी की आंदोलन विरोधी मानसिकता से देश में चल रहे तमाम छोटे-बड़े आंदोलन कमजोर होने के बजाय मजबूत होंगे .आने वाले दिनों में आंदोलनों और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच की जंग और तेज होगी और इसके लिए सभी को कमर कसकर तैयार रहना चाहिए .जो समाज या राजनीतिक दल आंदोलनों से मुंह मोड़ लेगा उसका नामलेवा भी नहीं बचेगा .(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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