स्वागत ऋतुराज बसंत

    महिमा वर्मा

हिन्दू धर्म में पीला रंग हमेशा से शुभता और शुचिता का प्रतीक रहा है। माता सरस्वती का भी प्रिय रंग पीला ही है। सादगी,निर्मलता शुद्धता और सात्विकता दर्शाता बसन्ती रंग बसंत पंचमी के पावन त्यौहार का परिचायक सा प्रतीत होता है |शायद इसीलिये माँ सरस्वती की पूजा-आराधना के वक्त लोग प्रायः पीले वस्त्र ही धारण करते हैं ।

भारतवर्ष की छः ऋतुओं बसंत,ग्रीष्म,वर्षा,शरद,हेमंत एवं शिशिर में बसंत ऋतु को अपने अप्रतिम सौन्दर्य एवं सुहावने मौसम के कारण ऋतुओं का राजा या ‘ऋतुराज बसंत ’कहा जाता है।बसंत जीवन में उत्सव के आगमन की सूचना है। इस ऋतु में पाँचों तत्व अपने सुहावने रूप में प्रकट होते हैं।बसंत के आगमन से पृथ्वी नव रूप से श्रृंगारित हो उठती है।प्रकृति का सौन्दर्य अपने उत्कर्ष पर रहता है|शस्य श्यामला धरा के पुष्पित,पल्लवित सौन्दर्य ने अनेकानेक कवियों के ह्रदय तारों को झंकृत कर अनमोल काव्य रसधारा की सरिता प्रवाहित की है।

देवी सरस्वती को समर्पित बसंत पंचमी भारतवर्ष में बसंत ऋतु आरम्भ की सूचक है एवं माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी की तिथि को हर्षोल्लास से मनाई जाती है।देवी सरस्वती जो ज्ञान,संगीत,ललित कलाओं की देवी हैं,जो ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं जिनके बिना सर्वत्र अज्ञान का अन्धकार व्याप्त हो जाएगा।बसंत पंचमी के दिन ही देवी सरस्वती ने संसार को अपनी वीणा से वाणी प्रदान की थी,तभी से निस्तब्ध,निशब्द ब्रम्हांड में पक्षियों का कलरव,झरनों की कलकल,गीत-संगीत की मधुर धारा,राग-रागिनियाँ,वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनियाँ और मानव को मेधा और वाणी प्राप्त हुई।इसीलिये इस दिन किसी भी कार्य की शुरुआत विशेष तौर पर अक्षरारंभ या विद्यारम्भ करने की प्रथा चल निकली।कलाकार भी इस दिन अपने वाद्य-यंत्रों की पूजा करते हैं।इस दिन अबूझ मुहूर्त रहता है अर्थात बिना मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ कर सकते हैं।बसंत पंचमी को चालीस दिनों के उपरान्त आने वाले होली के त्यौहार की शुरुआत भी हो जाती है।बसंत शीत ऋतु के ठन्डे मौसम के समापन और सूर्य की गुनगुनी धूप के उजास से भरे दिनों की शुरुआत है|पीला रंग जो बसंती भी कहलाता है बसंत ऋतु का परिचायक है।पीले रंग का बसंत पंचमी के सन्दर्भ में प्राकृतिक,धार्मिक,आध्यात्मिक महत्व है।

हिन्दू धर्म में पीला रंग हमेशा से शुभता और शुचिता का प्रतीक रहा है।माता सरस्वती का भी प्रिय रंग पीला ही है।सादगी,निर्मलता शुद्धता और सात्विकता दर्शाता बसन्ती रंग बसंत पंचमी के पावन त्यौहार का परिचायक सा प्रतीत होता है|शायद इसीलिये माँ सरस्वती की पूजा-आराधना के वक्त लोग प्रायः पीले वस्त्र ही धारण करते हैं।पीले पुष्प चढ़ा कर माथे पर पीला तिलक लगते हैं|यहाँ तक कि माँ को भोग भी पीले खाद्य पदार्थों का लगाया जाता है जैसे खिचड़ी,केसरिया चावल,बूंदी,केसरिया खीर,लड्डू इत्यादि|प्रकृति भी इस समय भरपूर पीले फलों और फूलों का अम्बार लगा देती है|इठलाती तितलियाँ,गुनगुन करते भौरें और चिड़ियों की चहचहाट वसंत का सम्पूर्ण वैभव दर्शाते हैं।हमारे सारे उत्सव कहीं न कहीं उस समय होने वाली वनस्पति या फसलों से जुड़े होते हैं।वसंतागमन के साथ ही सरसों फूल उठती है और मानों धरती पीली चुनरी ओढ़े इठलाती सी लगती है|सरसों के खेतों में दूर-दूर तक जहाँ तक भी  नज़र जाती है पीले फूल मंद मंद झूमते मन को मोह लेते हैं|आम के पेड़ सुनहरी बौर से लद कर एक अनोखी आभा से दमकने लगते हैं,जौ और गेंहू की बालियाँ खिल कर हवा में हलके हलके झूलती सी नज़र आती हैं,फसलें भी पक जाती हैं और प्रकृति खेतों को पीले-सुनहरे रंग से आच्छादित कर देती है। लहलहाती फसल की खुशी और सुहाना मौसम पंजाब की बालाओं को गिद्दा के जोशीले नृत्य में मस्त हो जाने को मजबूर कर देती है उस पर ढोल की थाप त्यौहार का आनंद द्विगुणित कर देती है।बसंत पंचमी सूर्य उत्तरायण के समय का उत्सव है।उत्तरायण अपने साथ सूर्य का मांगल्य साथ लाता है|वसंतागमन सूचक है शीत ऋतु की बिदाई का।शीतकाल के छोटे दिन और बड़ी रातें,धूमिल आसमान की जगह लेने लगते हैं तिल-तिल बढ़ते दिन,गुनगुनी धूप के उजास से भरा खिला-खिला आसमान।आसमान से गिरता ये पिघला सोना धरा को एक झीने सुनहरे आवरण से आच्छादित कर देता है।हमारी संस्कृति में सूर्य हमेशा से ही मांगल्य,तप,तेज,धर्म,ज्ञान का प्रकाश पुंज रहा है जो तम को दूर कर अपनी रोशनी और ऊष्मा से जग में जीवन संचार करता है।

वसंत ऋतु में प्रकृति अपना चोला बदलती है,नवरूप से श्रृंगारित होकर हमें भी पूर्वागृह,पुराने विचारों का परित्याग कर जीवन में नवीन को  समाहित करने की प्रेरणा देती है|अपने परिवेश में नित्य नए दृष्टिकोण अपनाकर,कुशलताओं को बढ़ाकर उन्नति की सीढियां चढ़ें।प्रकृति हर प्रतिकूल परिस्थिति से सामंजस्य बैठा कर,हर विरोधाभास के बीच भी जीवन जीने की कला सिखाती है।बसंत पंचमी ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का महोत्सव है और बसंती रंग इस महोत्सव का परिचायक|हमारे हर धार्मिक,सामाजिक,सांस्कृतिक,आध्यात्मिक उत्सव जन-मानस की आस्था के प्रतीक होने के साथ ही साथ जीवन के शाश्वत मूल्यों की पाठशाला भी होते हैं।आज ज्ञान के इस उत्सव में हम ऐसे किसी बालक या बालिका को शिक्षा का उपहार देने का प्रयत्न करें जो किसी अभाव के कारण विद्या के द्वार तक नहीं पहुँच पा रहा है।हमारा यह छोटा सा प्रयास शायद किसी के जीवन में सुनहरी उजास भर दे।बसंत-पंचमी का परिचायक यह बसन्ती रंग आज भी  शुभता,शुचिता,सात्विकता,शांति,सुरुचि,सकारात्मकता के अतिरिक्त सहनशक्ति  सौहार्द्र,सहृदयता,सहिष्णुता जैसे मानवीय गुणों को जीवन में समाहित करने की प्रेरणा देता है।

जब हँस रहे हों

पृथ्वी पर अजस्त्र फूल

सरसों और सूरजमुखी के

सूर्य भी जब चमक रहा हो

ठीक इसी रंग में

और यही रंग जब गिर रहा हो

सारी दुनिया की देह पर !!!

(एकांत श्रीवास्तव)

 

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