विजय बुधोलिया.

श्रीहरि विष्णु के अंशावतार और श्रीराम के अनुज होने के उपरान्त भी रामकथाओं में शत्रुघ्न का कोई विशेष उल्लेख नहीं है। यद्यपि शत्रुघ्न का चरित्र अत्यंत विलक्षण था। वे मौन सेवावृति थे। वे मितभाषी, सत्यवादी और विषय-विरागी थे। वे सदैव भरत के अनुगामी बने रहे। बचपन से ही भरत का अनुगमन और सेवा ही उनका मुख्य व्रत था (सूर सुसील भरत अनुगामी।)जिस तरह लक्ष्मण धनुष हाथ में लेकर राम के रक्षार्थ उनके पीछे चलते थे, उसी प्रकार शत्रुघ्न भी भरत के साथ रहते थे।उनमें शौर्य की कमी नहीं थी, किन्तु उन्हें इसके प्रदर्शन का कोई अवसर ही नहीं मिल पाया था।जबकि लक्ष्मण ने राम-भक्ति के साथ हर अवसर पर अपनी शूरता का प्रदर्शन किया।भरत ने भी त्याग और भातृप्रेम का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। श्रीराम की खड़ाउ को राजसिंहासन पर स्थापित कर नंदीग्राम में चौदह वर्ष तपस्वियों जैसा जीवन बिताया। शत्रुघ्न भी इस अवधि में भोग-विलासों से दूर रहे और भरत के निर्देशानुसार राजकाज चलाते रहे। राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न की विशेष आत्मीयता के संबंध में जो कथा है, उसमें बताया जाता है कि पायस का जो अंश कौशल्या ने सुमित्रा को दिया था उससे लक्ष्मण उत्पन्न हुए थे और यही राम-लक्ष्मण की घनिष्ठता का कारण है। इसी प्रकार जो अंश कैकेयी ने सुमित्रा को दिया था,उससे शत्रुघ्न पैदा हुए जिनकी धनिष्ठता भरत के साथ रही। कृतिवास रामायण के अनुसार दशरथ ने सुमित्रा की उपेक्षा करके कौशल्या और कैकेयी को पायस दिया था। सुमित्रा को उदास देखकर कौशल्या ने यह कह कर अपने पायस का आधा भाग दिया था कि यदि तुम्हे पुत्र हुआ तो यह मेरे पुत्र के साथ रहा करेगा,जिस पर सुमित्रा ने प्रतिज्ञा की थी –मेरा पुत्र तुम्हारे पुत्र का दास होगा। बाद में कैकेयी ने यही शर्त रखकर सुमित्रा को पायस का आधा भाग प्रदान किया।असमिया बालकांड में भी सुमित्रा को इसी शर्त पर पायस के दो भाग मिलते हैं।

धारणा है कि विष्णु ने चार अंशों में अवतार लिया था।हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण आदि में विष्णु के चार रूपों में प्रकट होने का उल्लेख मिलता है। (हरिवंश—कृत्वात्मानं महाबाहुश्चर्धा प्रभुरीश्वर:) फिर भी प्रारम्भ से ही राम को सबसे अधिक महत्व दिया गया तथा महाभारत में भी विष्णु के रामरूप में प्रकट होने का उल्लेख किया गया है। बाद की रचनाओं में भी राम को विष्णु का पूर्णावतार मान लिए जाने के बाद अन्य तीन भाइयों के उत्पत्ति के संबंध में नवीन धारणाएँ प्रस्तुत की गईं। अनेक रचनाओं में केवल राम और लक्ष्मण का उल्लेख है,जो विष्णु और शेष के अवतार हैं। इनमें नृसिंह पुराण, भागवत पुराण, रामचरितमानस (सेष सहस्त्रसीस जग कारन। सो अवतरेउ भूूमि भय टारन।।) आदि हैं। बाद की रचनाओं में भरत तथा शत्रुघ्न के अवतारत्व के विषय में सर्वाधिक प्रचलित धारणा यह है कि वे पांचजन्य शंख तथा सुदर्शन चक्र के अवतार हैं। अध्यात्म रामायण में लिखा है कि—‘भरतशत्रुघ्नौ शंखचक्रे: तथा ‘शंखचक्रे द्वे भरत सानुजं।’ आनन्द रामायण में भी इसका स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया गया है:
शंखो बभूव भरत: श्रीविष्णो: सव्यसत्करे।
वामे करे बभूवाथ शत्रुघ्नश्च सुदर्शनम्।।
इसी तरह का निर्देश पद्मपुराण, सत्योपाख्यान और रामरहस्य में भी है।
सारलादासकृत महाभारत के अनुसार विष्णु राम में अवतरित हुए, ब्रह्मा शत्रुघ्न में, इन्द्र भरत में तथा महादेव लक्ष्मण में।

विष्णु के सुदर्शन चक्र अथवा स्वयं ब्रह्मा जी ने भी भले ही शत्रुघ्न के रूप में अवतार लिया हो, पर सत्य यह है कि वाल्मीकि रामायण के प्रामाणिक कांडों भी शत्रुघ्न-विषयक सामग्री नगण्य है। संभव है कि इसी अभाव की पूर्ति करने के उद्देश्य से उत्तरकांड के रचयिताओं ने शत्रुघ्न द्वारा लवण-वध तथा मधुपुरी की स्थापना का वर्णन किया है। इस में वर्णित कथा इस प्रकार है। भार्गव च्यवन के नेतृत्व में यमुनातटवासी तपस्वी किसी दिन राम के पास पहुँचकर लवण नामक राक्षस से सुरक्षा मांगने लगे। लवण का पिता मधु धार्मिक था, उसने शिवजी से अजेय शूूल प्राप्त कर लिया था और उसे यह वरदान मिला था कि जब तक यह शूल उसके पुत्र के हाथ में रहेगा वह अवध्य होगा–अवध्य: सर्वभूतानां शूलहस्तो भविष्यति। इस शूल के बल पर वह तपस्वियों को सताया करता था। राम ने शत्रुघ्न का अभिषेक कर उनको लवण का वध करने और यमुना पर राजधानी बसाने का आदेश दिया। शत्रुघ्न ने एक विशाल सेना को मधुवन की ओर भेज दिया और बाद में अकेले ही वाल्मीकि के आश्रम होकर मधुवन की यात्रा की। शत्रुघ्न ने वाल्मीकि के आश्रम में एक रात बिताई, उसी रात में लव-कुश का जन्म हुआ। दूसरे दिन शत्रुघ्न ने मधुवन की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने च्यवन से मिलकर लवण द्वारा मान्धाता-वध की कथा सुन ली तथा लवण का वध करने के बाद वह मधुपुरी में राज्य करने लगे। बारह वर्ष बीत जाने के पर शत्रुघ्न ने राम से मिलने जाने का निश्चय किया। अयोध्या की यात्रा करते हुए वह फिर वाल्मीकि के आश्रम में ठहरे। वहाँ उन्होंने रामचरित का गान सुन लिया। अयोध्या में पहुँचकर शत्रुघ्न ने राम के पास रहने की इच्छा प्रकट की किन्तु राम ने क्षत्रिय धर्म का उल्लेख करके उन्हें केवल सात दिन अयोध्या में रहने की अनुमति दी।

उत्तरकांड में अन्य दो अवसरों पर शत्रुघ्न का उल्लेख किया गया है। उन्होंने राम के अश्वमेध यज्ञ में भाग लिया तथा लक्ष्मण की मृत्यु के पश्चात् उन्होंने अपने पुत्र सुबाहु को मधुरा में तथा शत्रुघाती को वैदिश में राजसिंहासन पर बैठाकर राम तथा भरत के साथ वैष्णव तेज में प्रवेश किया।

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