@ राकेश अचल

हमारे यहां लोग हमेशा से फुर्सत में रहते हैं.उन्हें बहस के लिए कोई न कोई मुद्दा चाहिए,क्योंकि किसी को अपनी ड्यूटी में कोई दिलचस्पी नहीं है. सब एक-दूसरे की टोपी उछालने के लिए कमर कसकर खड़े रहते हैं. अब भाई लोगों के पेट में दर्द हो रहा है कि साल भर पहले भाजपा में शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया की रेंक भाजपा में एक नंबर के बजाय दस नंबर की क्यों हो गयी ? भाजपा द्वारा हाल ही में बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए जारी स्टार प्रचारकों की सूची को सिंधिया की रैंकिंग का आधार बनाया है .
सिंधिया कांग्रेस में भी कभी एक नंबर के नेता नहीं रहे.मध्यप्रदेश में भी उनका नंबर एक नहीं था.नंबर एक का कोई एक ही हो सकता है जो कांग्रस और भाजपा में पहले से मौजूद है. जहाँ तक सवाल दो नंबरी होने का है तो ये भी बहुत ज्यादा विवाद का रेंक नहीं है.हर पार्टी में दो नंबरी आदमी या नेता अलग से दिखाई देता है. कहीं किसी का बेटा या बेटी दो नंबर पर होता है तो कहीं भतीजा,भांजा या कोई और सगा संबंधी .सिंधिया इस मामले में नसीब वाले हैं कि वे किसी शीर्ष नेता के सगे संबंधी नहीं हैं. उनकी या उनके पूर्वजों की जो भी रैंकिंग जिस दल में भी रही है उसके पीछे उनकी अपनी विरासत और हैसियत रही है.
ताश खेलने वाले जानते हैं कि ताश के पत्तों में इक्के,बादशाह,बेगम और गुलाम को आप किसी भी क्रम में रख दीजिये उनका महत्व कभी कम नहीं होता.यही हाल सिंधिया का भी है. वे किसी भी दल में किसी भी क्रम पर खड़े किये जाएँ उनकी आभा धूमिल नहीं होती .सिंधिया समझदार नेता हैं इसलिए नयी पार्टी में अभी तक खुद को नेता नहीं कहते,उन्होंने हमेशा कहा है कि वे भाजपा के कार्यकर्ता हैं .सिंधिया कार्यकर्ताओं की कतार में खड़े या बैठकर पहचाने जाने में अभी तक तो अपने आपको लज्जित अनुभव नहीं करते,फिर दूसरे दलों के लोगों के उनके भाजपा में दस नंबरी होने पर ऐंठन क्यों होती है,समझ से बाहर है ?
ज्योतिरादित्य सिंधिया के परिवार में राजनीति का पहला कदम उनकी दादी स्वर्गीय राजमाता ने रखा था. वे पहले कांग्रेस में फिर जनसंघ में और फिर जीवन पर्यन्त भाजपा में रहीं लेकिन हर पार्टी में उन्हें नंबर एक कभी नहीं बनाया गया,लेकिन इससे उनकी हैसियत पर कभी कोई फर्क पड़ते मैंने तो नहीं देखा .जिस पार्टी में वे रहीं उनके लिए पलक पांवड़े बिछाए जाते रहे ,नंबर से उसका कोई लेनादेना नहीं था ,यही हाल ज्योतिरादित्य सिंधिया के स्वर्गवासी पिता माधवराव सिंधिया का था. वे पहले निर्दलीय रहे,जनसंघी भी रहे ,कांग्रेसी भी रहे और गैर कांग्रेसी भी किन्तु उनकी हैसित जैसी थी उसमें राई-रत्ती का अंतर् नहीं आया .वे दोनों अजेय रहे,किन्तु ज्योतिरादित्य सिंधिया के हिस्से में दुर्भाग्य से ये यश नहीं आया .
बंगाल में सिंधिया पहले नंबर पर जाएँ या दसवें नंबर पर उनकी सभाओं में भीड़ उतनी ही आएगी जितनी पार्टी ने अपेक्षा की होगी .सिंधिया के पास उनसे ऊपर रखे गए अन्य 9 भाजपा नेताओं से ज्यादा चुंबकीय व्यक्तित्व है. वे लच्छेदार भाषण देने में भी अपने से ऊपर रखे गए 9 नेताओं से आगे हैं ,इसलिए उनकी रैंकिंग पर बहस बेमानी है .बहस तो इस बात पर होना चाहिए की भाजपा ने पार्टी में आये अन्य नेताओं की तरह बर्फ में नहीं लगाया बल्कि उनका सतत इस्तेमाल किया है .अन्यथा भाजपा का इतिहास बताता है कि इस पार्टी में अन्य दलों से आने वाले नेताओं के पंख काटकर छोड़ दिया जाता है .ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ.
सिंधिया परिवार के राजनीति में आये तीनों सदस्य शुरू से केंद्र की राजनीति में दिलचस्पी लेते रहे हैं,इसलिए बहस इस बात पर हो सकती है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ज्योतिरादित्य सिंधिया को कब अपने मंत्रिमंडल में शामिल करते हैं ?सिंधिया की प्रतिभा का सही इस्तेमाल केंद्रीय मंत्रिमंडल में ही किया जा सकता है. राज्य की राजनीति में वे जो करिश्मा दिखा सकते थे दिखा चुके .बंगाल के विधानसभा चुनावों में सिंधिया की भूमिका सीमिति और स्टार प्रचारक जैसी ही है. वहां अग्निपरीक्षा तो कैलाश विजयवर्गीय और खुद गृहमंत्री अमित शाह दे रहे हैं .
मुझे पक्का यकीन है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की किस्मत नयी करवट लेगी .उनका धैर्य उनके लिए लाभदायक साबित होगा .राजनीति में अधीर नेता जल्द ठिकाने लग जाते हैं या लगा दिए जाते हैं .सिंधिया ने काफी समझदारी का प्रदर्शन क्या है .मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बनवाने के बाद भी उन्होंने अपने हिस्से का एक पौंड गोस्त नहीं माँगा,जो मिल गया उसी में संतोष कर लिया .एक खानदानी सामंत होने के नाते ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा में एक आम कार्यकर्ता जैसा व्यवहार उनके धैर्य का परिचायक है ,वरना बिना ‘महाराज’ शब्द सुने इस परिवार में किसी को क्या नींद आ सकती है.यहां तक कि परिवार की महिला सदस्यों तक को ‘महाराज’ कहा जाता है .
भाजपा में शामिल होने के बाद सिंधिया के महल में पहले जैसी रौनक दिखाई देने लगी है .उनके साथ कांग्रेस से भाजपा में आये कार्यकर्ताओं और नेताओं के अलावा अब भाजपा के नेता और कार्यकर्ता भी महल में अपनी हाजरी देने लगे हैं ,जो भाजपा में सिंधिया की स्वीकार्यता का स्पष्ट संकेत है .सिंधिया के लिए अवसर है कि वे अंचल में एक बार अपने शर्म से सिंधिया परिवार के हिस्से में आयी पराजय को फिर से जय में बदलें .आगामी आम चुनाव तक वे राजनीति में रहकर परिवार की राजनितिक विरासत को कितना मजबूत कर पाते हैं इसके लिए समय की प्रतीक्षा करना चाहिए.

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