ममता बनर्जी का देश के विपक्षी दलों के नेताओं को पत्र लिखना इशारा करता है कि ममता ने अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की शिकस्त की संभावना को स्वीकार कर आगे की रणनीति सोचना शुरू कर दिया है। 
संवाददाता

नईदिल्ली.  पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण के लिए बुधवार को संपन्न मतदान के संकेत क्या हैं और नंदीग्राम से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जीत रही हैं अथवा नहीं, इसे लेकर मीडिया में कयासों की बाढ़ आ गई है और अलग-अलग पत्रकारों, विश्लेषकों और राजनेताओं की राय विभाजित है लेकिन कुछ संकेत स्पष्ट हैं। ममता बनर्जी का देश के विपक्षी दलों के नेताओं को पत्र लिखना इशारा करता है कि ममता ने अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की शिकस्त की संभावना को स्वीकार कर आगे की रणनीति सोचना शुरू कर दिया है। 

यदि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी जिसमें तृणमूल को मामूली विपक्ष की हैसियत प्राप्त हुई तो ममता राष्ट्रीय राजनीति करेंगीं। बुधवार को उन्होंने देश के तमाम विपक्षी दलों से लोकतंत्र बचाने के लिए एकजुट होने की अपील की।  इसके साथ ही उन्होंने 9 बिंदुओं का एक चार्टर भी सामने रख दिया। इसमें उन सभी आरोपों और शिकायतों को एक जगह एकत्र किया गया है जिन्हें विपक्ष की पार्टियां अलग-अलग मौकों पर उठाती रही हैं। नंदीग्राम में 80% से अधिक मतदान हुआ है।  यह वोटिंग प्रतिशत और ममता की आखिरी दिन की गतिविधियां क्या बताती हैं, इसे लेकर विश्लेषकों के अलग-अलग मत हैं। कुछ लोग मानते हैं कि तृणमूल कांग्रेस का वोट बरकरार है। यदि नंदीग्राम से भाजपा  प्रत्याशी व ममता के पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी तृणमूल के कार्यकर्ताओं को रोक पाते और तृणमूल के प्रतिबद्ध वोटर को मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचने देते तो मतदान का प्रतिशत कम रहता लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके हैं।

नंदीग्राम में इन दिनों दिल्ली के पत्रकार डेरा डाले हैं। उन्होंने गांवों का दौरा कर आम मतदाता से बातचीत की है। इन बातचीतों के सार को देखें तो यही बात उभरती है कि ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी बीच कड़ा मुकाबला है। कुछ लोग मानते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में, खास तौर पर महिला मतदाताओं में ममता का क्रेज बरकरार है। जबकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि कट मनी और कमीशन ने तृणमूल सरकार की चूलें हिला रखी हैं। इन विश्लेषकों का मानना है कि ममता की सरकार यदि काम के आधार पर समर्थन जुटा पाती तो ममता बनर्जी को 3 दिन तक नंदीग्राम में डेरा नहीं डालना पड़ता।  ना ही उन्हें यहां अपना गोत्र बताने की आवश्यकता पड़ती। इस चुनाव क्षेत्र में ममता की जड़ें शुभेंदु अधिकारी के परिवार की बदौलत स्थापित हुई थीं। यह परिवार क्षेत्र में तृणमूल के तमाम हथकंडों का प्रवर्तक रहा है। अब वही शुभेंदु अधिकारी परिवार भारतीय जनता पार्टी के साथ है, तो जाहिर है कि तृणमूल को भाजपा उसी के हथियार से काट रही है। इसीलिए यहां हिंसा, दबाव, उत्पीड़न,मतदान करने से रोकने और डराने जैसी शिकायतों का सामना तृणमूल को करना पड़ा। पिछले चुनाव तक ये शिकायतें भारतीय जनता पार्टी की ओर से आती थीं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर ममता बनर्जी के लोकतंत्र बचाओ के नारे के प्रति भले ही थोड़ा बहुत आकर्षण हो, पश्चिम बंगाल में बिल्कुल नहीं। क्योंकि यहां लोकतंत्र का गला घोंटने में तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐन चुनाव के बीच लोकतंत्र बचाने के लिए राष्ट्रीय दलों के आह्वान का सीधा मतलब यही है कि ममता बनर्जी भविष्य की राजनीति की भूमिका रच रही हैं। लेकिन यदि उन्हें भाजपा से लड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर का मोर्चा बनाने की इतनी ही चिंता होती तो वह इसे चुनाव के पहले व्यक्त करतीं और उस दिशा में प्रयास करतीं।  जाहिर है कि यह चिंता राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा या मोदी के विकल्प के अभाव की नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने की ज्यादा है। पर लोकतंत्र बचाने, सांप्रदायिकता से लड़ने या मोदी की कथित तानाशाही से निपटने की राष्ट्रीय स्तर पर नारेबाजी ही होती है। विपक्षी दलों के नेता गाहे-बगाहे कुछ मंचों पर आकर हाथों में हाथ डालकर इन नारों को स्वर देते हैं और जब चुनाव आते हैं तो उनकी एकता का प्रदर्शन टूट जाता है या फीका पड़ जाता है। बेंगलुरु में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के पहले जनता दल के न्योते पर इकट्ठे हुए विपक्षी दलों के बीच बाद में हुए झगड़े इसका बड़ा उदाहरण हैं। उत्तरप्रदेश में भी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच की सहमति ज्यादा नहीं चली थी। विपक्षी दलों की एकता स्थापित करके राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की ममता बनर्जी की कोशिश विपक्ष में बैठे कई महत्वाकांक्षी नेताओं के आगे कितनी कामयाब होती है यह भविष्य के गर्त में है लेकिन ऐसा मोर्चा तब तक मोदी और भाजपा का विकल्प नहीं बन सकता जब तक ये विपक्षी दल अपने प्रभाव क्षेत्र में जनाधार को मजबूत नहीं करते। देश का सबसे बड़ा दल कांग्रेस ही ऐसे गठबंधन का नेतृत्व करने का स्वाभाविक दावेदार होता था जो अपने आधार को निरंतर खो रहा है। दक्षिण में जनता दल, कश्मीर में पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस, हरियाणा में चौटाला का लोकदल, आंध्र में तेलुगू देशम जैसे दल भी इसके उदाहरण है।(इंडिया डेटलाइन)

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