प्रदेशवार्ता. नौकरशाही हर जगह हावी है. निजी स्कूल भी अब इनकी मनमानी की चपेट में आ गए हैं. नवीन मान्यता के नाम पर ऐसे ऐसे पेंच फंसा दिए है कि निजी स्कूलों के लिए ये पूरे करना संभव नहीं होगा. खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूल पहले से ही संघर्ष कर रहे, नए नियम उनका हलक सूखा रहे हैं. दरअसल निजी स्कूलों में बडी तादात उन स्कूलों की है जो निम्न वर्ग व निम्न मध्यम वर्ग के बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं. ये पालक फीस भी समय पर जमा नहीं कर पाते, लेकिन एडजस्ट कर सब कुछ चलाया जा रहा हैं. ऐसे ही गांव में किसान फसल का पैसा आने के बाद फीस देते हैं, सब उधारी मे गुडविल बनाकर चल रहा था कि अब भोपाल से अफसरों ने नियमों के नाम पर मनमानी का पुलिंदा सिर पर रख दिया हैं. एक तरफ सरकार विदेश में जाकर निवेश खोजती है वहीं दूसरी तरफ शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार देने का मंच भी खत्म कर रही हैं. अफसरों के बच्चे न तो सरकारी स्कूल में पढते है न ही छोटे कद के निजी स्कूलों में.. ऐसे में वे समझ नहीं पाएंगे एक श्रमिक और किसान पिता का दर्द.
राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा सत्र 2025-26 एवं आगे हेतु मान्यता नवीनीकरण हेतु पोर्टल खोला गया है। मान्यता हेतु 40,000 की एफडी अनिवार्य की गई है। कम फीस में एवं छोटी बस्तियों के गरीब बच्चों को पढ़ाने वाले स्कूलों के लिए यह प्रावधान आर्थिक बोझ है। शासन द्वारा दो-दो वर्षों तक आर.टी.ई की फीस प्रतिपूर्ति रोकी जाती है जो कि लाखों में होती है। अप्रत्यक्ष रूप से स्कूलों की एफडी इस रूप में सतत शासन के पास होती है। अतः एफडी की अनिवार्यता को समाप्त करना चाहिए. रजिस्टर्ड किरायानामा न सिर्फ सतत् आर्थिक बोझ है अपितु स्कूलों के अस्तित्व पर भी बडा संकट है. अविकसित, अर्ध विकसित कॉलोनी में या जहां डायवर्शन नहीं हुआ है वहां रजिस्टर्ड किरायानामा संभव नहीं है. वर्तमान रजिस्ट्री कानून के तहत ऐसे में कई स्कूल बंद हो जाएंगे एवं हजारों टीचर बेरोजगार होंगे एवं बच्चों का भी बड़ा नुकसान होगा। रजिस्टर्ड किरायेनामे के स्थान पर 500-1000 रुपए के स्टांप पर इसे स्वीकृत किया जाना चाहिए. राजस्व बढ़ाने की मंशा में बच्चों एवं शिक्षकों के भविष्य से खिलवाड़ न हो जाए।
