श्योपुर जिले के ग्राम्यांचल से रूबी सरकार की ग्राउंड रिपोर्ट

गांव के पुरुषों द्वारा लगातार दुत्कारे जाने के बावजूद  लड़कियों ने हिम्मत नहीं हारी। आखिर वह दिन भी आया, जब इन लोगों ने अपने-अपने गांवों में दस-दस महिलाओं को घर की चहारदीवारी से बाहर लाकर समूह खड़ा कर लिया।

भोपाल. इंडिया डेटलाइन. रोहिणी शर्मा, मनवार वर्मा, पिंकी वर्मा और कृष्णा जादौन- चार सहेलियां श्योपुर जिले के कराहल विकासखण्ड के अलग-अलग गांव की हैं। इनमें खास बात यह है कि चारों ने एक साथ बीए पास किया और गांवों में हाशिये पर जीवन जी रहे अनुसूचित जाति व जनजाति परिवारों की स्थिति सुधारने का मन बनाया। इनकी यह इच्छा तब पूरी हुई, जब बुंदेलखण्ड और ग्वालियर-चम्बल इलाके में आजीविका को लेकर काम करने वाली एक सामाजिक संस्था ने इन्हें अवसर दिया। इन महिलाओं में दो पिछड़ी और दो सामान्य जाति की हैं। परंतु घर पर रूढ़िवादी सोच सबकी एक जैसी ही है।

दरअसल पानी, आजीविका, पर्यावरण तथा महिला सशक्तीकरण को लेकर लगभग ढाई दशक से इन क्षेत्रों में काम रही इस संस्था ने जब कराहल विकासखण्ड में अपना काम शुरू किया, तो उनके मन में यही था कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में काम करना है, तो गांव की महिला ही हों, जो थोड़ी पढ़ी-लिखी  और महिला सशक्तिकरण की अपनी समझ रखती हों। जी आई जेड के सहयोग से काम कर रही परमार्थ संस्था के सचिव संजय सिंह ने बताया कि गांव की महिलाएं गांव की समस्याओं से अच्छी तरह परिचित होती हैं। इससे संस्था का काम थोड़ा आसान हो जाता है। जब हमने नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की, तो सैकड़ों की संख्या में आवेदन प्राप्त हुए। इन्हीं आवेदनों के बीच हमें बिल्कुल वैसी चार पढ़ी-लिखी लड़कियां मिल गईं। जिनकी रुचि और जज्बे को देखकर मैंने इन चारों को दो-दो गांव की जिम्मेदारी सौंप दी। मुझे खुशी है कि इनका काम संतोषजनक रहा। मामूली मानदेय में इन लोगों ने बहुत कम दिनों में ही अपने-अपने गांव की दशा और दिशा बदल दी।

जब इस संवाददाता ने चारों लड़कियों से बात की, तो उनके जवाब सुनकर स्वयं को छोटा महसूस किया।  हमने सोचा, हम जिस कमेंटमेंट के साथ पत्रकारिता में आते हैं, क्या वह पूरा कर पाते हैं! लड़कियों ने कहा, पढ़-लिखकर अगर आप अपने घर और गांव का वातावरण न बदल सके, तो आपका पढ़ना-लिखना बेकार है। पैसे तो सभी कमा लेते है, लेकिन महिला अधिकारों की बात करते हुए समाज में बदलाव लाने का प्रयास उनमें से कितने लोग करते हैं। उन्होंने कहा, हमारी समझ से अमीर और बड़े होने से बेहतर है एक अच्छा इंसान होना। अपने समाज का भला करना..और इसकी शुरुआत अपने गांव से ही हो, तो क्या कहने। गांव के पुरुषों द्वारा लगातार दुत्कारे जाने के बावजूद  लड़कियों ने हिम्मत नहीं हारी। आखिर वह दिन भी आया, जब इन लोगों ने अपने-अपने गांवों में दस-दस महिलाओं को घर की चहारदीवारी से बाहर लाकर समूह खड़ा कर लिया।

मनवार बताती हैं कि महिलाओं के साथ काम करने के लिए सबसे पहले उन्हें घर के चौखट से बाहर निकालना पड़ता है, जो पुरुष कभी नहीं चाहते। महानगरों की बात और है, वहां महिलाओं को कानून के बारे में पता होता है, लेकिन गांव में अभी भी पुरुष जो कहे, वही कानून है। इस सोच को तोड़ना बहुत मुश्किल था। वहीं महात्मा गांधी के विचारों से  प्रभावित रोहिणी बताती है, कि जीवन की जरूरतें जितनी कम हो सकें रखनी चाहिए। महिलाओं को जागरूक करने के अलावा बाकी बचे समय में रोहिणी पर्यावरण के लिए छोटे स्तर पर काम भी करती है।

पिंकी बताती है ‘जब हमने काम शुरू किया था, तब हालात ऐसे नहीं थे। लोगों के असहयोग की प्रवृत्ति से हमें बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़़ा था। यहां तक कि जब हम लोग मुख्यमंत्री से मिलने भोपाल गए तो गांव वालों ने यह फैला दिया कि यह सब बदचलन लड़कियां है। लेकिन इससे हम लोग जरा भी हतेात्साहित नहीं हुए बल्कि और मजबूत इरादों से गांव में काम करने लगी और तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपने लक्ष्यों पर निगाह बनाए रखा।’ पिंकी अपने अनुभव साझा करते हुए बताती है कि पुरुष हमेशा महिला के सामाजिक योगदान पर निष्क्रियता की मोहर लगा देते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि उन्हें मौका ही नहीं दिया जाता। गांव में कभी भी महिलाओं को सामाजिक रूढ़ियों से अलग करने र्की कोशिश नहीं होती। जब तक महिलाएं सामाजिक रूढ़ियों से अलग नहीं होंगी, तब तक पूरी तरह से उनका सशक्तीकरण नहीं होगा। परिवार और समाज की ओर से उन्हें आगे लाने का जो समर्थन मिलना चाहिए, वह उन्हें आज भी नहीं मिलता है।  यह काम सरकारी स्तर पर तो नहीं हो सकता, क्योंकि सरकार का प्रयास राजनीतिक स्तर पर हो सकता है, परंतु सामाजिक जागरुकता बढ़ाने का काम गैर सरकारी स्तर पर करना होगा।

कृष्णा बताती हैं ‘कराहल में हम लोगों ने अपने-अपने घर के पास वाले गांव को चुना। हमने पर्तवाड़ा और निमानियां, पिंकी वर्मा ने बनार , बरगुंआ, रोहिणी ने रासौन , किरकिरी और मनवार वर्मा ने सिलपुर और पनवाड़ा चुना। इस तरह कुल आठ गांवों में हम लोगों ने आठ समूह बनाए। प्रत्येक समूह में दस-दस महिलाएं हैं। यानी कुल 80 महिलाओं को हमलोगों ने अपने साथ जोड़ा और उन्हें आजीविका और बच्चों की देखभाल का प्रशिक्षण दिया। आज ये महिलाएं आपस में लेन-देन करती हैं,खेती का सारा काम करती हैं। बाजार जाकर खाद -बीज खरीदती है। एक-एक पैसे का हिसाब रखती हैं और बैंक में रुपये जमा करने और निकालने के लिए स्वयं जाती हैं। इन्हें कुपोषित बच्चों का देखभाल करना आ गया है। गर्भवती महिला से लेकर बच्चे को कब-कब टीका लगना है यह सब उन्हें मालूम है। गर्भवती महिलाओं की सूचना आंगनबाड़ी में देना और उनके स्वास्थ्य की देखभाल के प्रति भी ये महिलाएं जागरूक हुई हैं। अब इनके जीवन में घरेलू हिंसा जैसी कोई बात नहीं है। वर्तमान में ये 80 महिलाएं अपने-अपने गांव की अन्य महिलाओं को प्रेरित कर रही हैं।’

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