Sunday, June 28th, 2026 | 8:56 AM

आंगनवाड़ी की नौकरी ने ग्रेजुएट लडकी को अपने गांव में बना दिया पराया, प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद भी नहीं माने ग्रामीण

by Amjad Shaikh

प्रदेशवार्ता. गांव की पहली ग्रेजुएट लडकी की सफलता का जश्न तो पूरे गांव को मनाना था. लडकी का हौसला उत्साह बढाना था ताकि वो और आगे बढे, लेकिन लकीर के फकीर वाली सोच ने लडकी की जिंदगी में तूफान ला दिया. लडकी अब भी अपने कठिन समय में संघर्ष कर रही है तथा उम्मीद कर रही है कि एक न एक दिन माहौल और सोच बदलेगी.
14 फरवरी को जिला प्रशासन के अधिकारियों और राज्य महिला आयोग की टीम ने ओडिशा के केंद्रपाडा जिले के नौगांव का दौरा किया और ग्रामीणों से वादा लिया. वादा ये लिया कि ग्रामीण अपने बच्चों को सोमवार से आंगनवाड़ी केंद्र पर भेजेंगे. इसके पहले भी प्रशासन के अफसर गांव वालों को समझा चुके लेकिन वे मानने को तैयार नहीं हैं. गांव की आंगनवाड़ी में बच्चों की संख्या जीरो हो गई. आखिर ये हालत क्यों बने…? क्यों ग्रामीण अपने बच्चों को आंगनवाड़ी नहीं भेज रहे और न ही आंगनवाड़ी से राशन ले रहे…? तो इसके पीछे है जातिगत अभिमान का दंभ. 21 साल की शर्मिष्ठा सेठी को आंगनवाड़ी में कुक की नौकरी मिली थी. शर्मिष्ठा दलित समुदाय से आती हैं. बस इसी के बाद शर्मिष्ठा का ग्रामीणों ने विरोध कर दिया. नाराज ग्रामीणों ने बच्चों के आंगनवाड़ी जाने पर रोक लगा दी. शर्मिष्ठा को 20 नवंबर ने काम करना शुरू किया. शर्मिष्ठा के कुक बनते ही स्तनपान कराने वाली माताओं ने भी केद्र से राशन घर ले जाना बंद कर दिया. शर्मिष्ठा हर रोज उम्मीद में जी रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि नियम से काम करने पर एक दिन गांव वाले मान जाएंगे. वो रोज सुबह 7 बजे साइकिल से स्कूल पहुंचती है, जमीन साफ करती है और बच्चों के लिए चटाई बिछाती हैं, इंतजार करती हैं. शर्मिष्ठा चाहती है कि अगर उसके हाथ का खाना नहीं खाना चाहते तो कोई बात नहीं, कम से कम राशन तो घर ले जाए. लेकिन ग्रामीणों ने इसका भी मना कर दिया. इस बेरूखे व्यवहार से शर्मिष्ठा का परिवार भी दुखी है. 86 साल की दादी के साथ माता. पिता भी असहज हैं. आंगनवाड़ी की इस नौकरी के लिए गांव के अंदर शर्मिष्ठा अकेले ही पात्र उम्मीदवार थी. पांच हजार रुपए की सैलरी से शर्मिष्ठा अपने परिवार की मदद करना चाहती हैं. पिता चेतन्य एक एकड से भी कम जमीन पर खेती करते हैं और दूसरों के खेतों में मजदूरी भी करनी पडती हैं. गांव में सात दलित परिवार और 90 ऊंची जाति के परिवार हैं. डिप्टी कलेक्टर अरुण कुमार नायक ने कहा अधिकारी खुद शर्मिष्ठा के हाथ से बनाया खाना खाएंगे, अगर बहिष्कार नहीं रूका तो फिर कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी. शर्मिष्ठा कहती है ये हमारे गांव का मामला है में इसे आगे तक नहीं ले जाना चाहती.

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